लॉक टाउन डाउन के साइड इफेक्ट

लॉक डाउन जैसे-जैसे आगे बढ़ेगा , हमें कुछ असुविधाजनक फैसले लेने होंगे । एक सीमा के बाद लॉक डाउन बढ़ाने का अर्थ होगा - गरीबी ,बेरोजगारी और भूख से मौत । हमें फैसला करना होगा कि लोगों को बीमारी से मरने दिया जाए या भूख से।

जब जान बचाने के संसाधन कम होंगे और बीमार ज्यादा तब किसकी जान बचाई जाए और किसे मरने दिया जाए ?

पिछले दिनों एक देश ने 60 साल से अधिक उम्र के व्यक्तियों को वेंटिलेटर देने से मना कर दिया ताकि जवान लोगों को बचाया जा सके । यह एक फैसला है ! एक फैसला जिसमें हम स्वीकार करते हैं कि एक व्यक्ति की जान दूसरे व्यक्ति से अधिक कीमती है ! इस फैसले का आधार यहां उम्र है । पर किसी और देश ,समाज या काल में यह आधार जाति , धर्म , लिंग , नस्ल , शैक्षणिक योग्यता , आर्थिक स्थिति या समाज के लिए उपयोगिता कुछ भी हो सकता है ! यदि हमें यह फैसला करना हो तो हम अपने डॉक्टरों को इनमें से किसे आधार बनाने को कहें । इस प्रश्न का उत्तर चिकित्सा विज्ञान की किताबों में नहीं है । यह एक दार्शनिक प्रश्न है ! डॉक्टर समाज से पूछेंगे कि आप बताइए कि हम किसकी जान बचाएं और किसे मरने दें ।
दर्शनशास्त्र में इसे 'ट्रॉली प्रॉब्लम" कहते हैं ।

हाल ही में जब गूगल ने अपनी ड्राइवरलेस कार सड़कों पर उतारने की तैयारी की तो इंजीनियरों को इसी तरह के एक दार्शनिक प्रश्न से जूझना पड़ा।

मान लीजिए एक ड्राइवरलेस कार तेज रफ्तार से एक पहाड़ी रास्ते पर जा रही है । अचानक इस कार के सामने एक बच्चा आ जाता है। कार में लगे कंप्यूटर के सामने दो विकल्प हैं या तो बच्चे को कुचल कर आगे बढ़े या खुद खाई में गिर जाए और अपने मालिक को मार दे !

कंप्यूटर यह फैसला कैसे करेगा ?

अब तक इस तरह की उलझन में इंसान ड्राइवर अपने हिसाब से अलग-अलग फैसले करते थे , पर कंप्यूटर ऑब्जेक्टिविटी चाहता है । वह एक निर्धारित प्रक्रिया से चलता है जिसे एल्गोरिदम कहते हैं और यह हर स्थिति में एक ही होगा । वह कहता है सड़क पर उतरने से पहले मुझे बताइए कि ऐसी स्थिति में मुझे क्या करना है ? बच्चे को बचाऊं या मालिक को ? इस फैसले में उम्र , लिंग , समाज के लिए उपयोगिता जैसे पहलुओं को आधार बनाउं या एकतरफा फैसला लूं ?
यह समस्या अब तक अनसुलझी है। युवाल नोआह हरारी ने मज़ाक में इसके लिए एक सुझाव दिया उन्होंने कहा आप दो कारें बनाइए ,और उपभोक्ता को तय करने दीजिए कि वह ऐसी कार चाहता है जो खुद उसे मार दे जा ऐसी जो बच्चे को मार दे । बच्चे को मार देने वाली कार खरीदने वाले के अपराध बोध की कल्पना सहज ही की जा सकती है ।
यदि दो इंसानों में किसी एक की जान बचाई जा सकती हो तो यह फैसला कैसे लिया जाए , इस प्रश्न का उत्तर हम शायद ही कभी खोज पाएं । इंसान की जान की कीमत कैसे लगाई जाए ? हर एक समाज के जीवन मूल्य अलग होते हैं । कोई समाज अपने बूढ़ों की ज्यादा इज्जत करता है, कोई बच्चों को महत्वपूर्ण मानता है , कोई युवा आबादी को सबसे ज्यादा मूल्यवान ! क्या किसी की जान को इसलिए कमतर माना जा सकता है कि वह समाज के लिए उतना कंट्रीब्यूट नहीं कर पा रहा जितना कि ऐसी स्थिति में उसका प्रतियोगी!
यदि उपयोगिता ही सब कुछ है तो फिर इंसान और मशीन में क्या फर्क है ?
दुआ कीजिये कि यह कोरोना जल्दी ही चला जाए और हमें ऐसे कोई फैसले न करने पड़ें!

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Yeh vidhi ka vidhan hai.