नैरेटिव कैसे सैट किया जाता है
नैरेटिव कैसे सैट किया जाता है
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मेरे एक करीबी रिश्तेदार हैं , जो की कांग्रेस में एक बहुत बड़े मंत्री पद पर हैं.
बड़े मतलब बहुत ही बड़े , उनकी पहुँच सीधे कांग्रेस के टॉप तीन नेताओ तक हैं।
एक बार बातचीत मेंउन्होंने बताया की कैसे बीजेपी ये नैरेटिव सैट करने में अप्रतयश्चित रूप से सफल रही की मनमोहन सिंह जी एक कठपुतली प्रधानमंत्री हैं।
चूँकि वो मनमोहन सिंह जी को शुरू से और राहुल और सोनिया को तो छोड़िये , वो राजीव गांधी तक को बचपन से देखतें आएं हैं और उनके स्वभाव और ककिरदार से भली भाँती परिचित हैं।
उन्होंने बताया की मनमोहन सिंह जी जैसे व्यक्तित्व को किसी भी तरीके और किसी भी प्रभाव से निर्देशित करना लगभग असंभव हैं।
कांग्रेस तो छोड़िये , पूरे देश और अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक कोई ऐसा अर्थशाष्त्री नहीं है जो उनकी किसी भी योजना या आर्थिक नीतियों को चैलेन्ज कर सके।
ये सही है की 90 के दशक के बाद से पूरी दुनिया अमेरिकी पूंजीवादी मॉडल पर चली है और मनमोहन सिंह भी इसके अपवाद नहीं है।
और इन्ही नीतियों को भारत में भी लागू करने के बावजूद उन्होंने पूंजीपतियों और जनता के बीच एक सामंजस्य बनाये रखा और पूंजीपतियों को उनकी मनमानी करने से काफी हद तक रोके रखा।
जो लोग कहतें हैं की मनमोहन सिंह जी सोनिया गांधी के इशारे पर काम करते थे या उनसे पूछ कर काम करते थे , उन्हें शायद ये तक नहीं मालूम की सोनिया जी को अर्थशास्त्र की ABCD समझाने वाले तक मनमोहन सिंह ही हैं।
कांग्रेस राज में तय की जाने वाली हर अर्थनीति को मनमोहन सिंह जी खुद रिव्यू करते थे , और सोनिया जी बाद में उस निति के अच्छे बुरे पॉइंट्स को देखकर सिर्फ अपनी राय रखती थी।
उन्होंने मनमोहन सिंह से कभी भी किसी निति के बारे में कोई सवाल तक नहीं किया , वरन वो तो उनसे कुछ विशिष्ट योजनाओ के लिए विनती ही करती थी।
उन्होंने मनमोहन सिंह से व्यक्तिगत रूप से मनरेगा और खाद्य सुरक्षा बिल को शश्क्त बनाने के लिए विनती करि थी।
उन्होंने मनमोहन सिंह जी से इच्छा जताई थी की आप इस बिल पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान दीजिये .
राहुल के बारे में उन्होंने बताया की -
राहुल खुद अपने आप में एक समझदार , पढ़ा लिखा , और बहुत ही अच्छा श्रोता है।
वो बिना सुने समझे किसी भी बात पर अपनी राय नहीं देता। और यही समझदारी के चले उसे खुद से ये भान है की मनमोहन सिंह जैसे व्यक्तित्व से अर्थशास्त्र तक पर अंतर्विरोध रखने के लिए ज्ञान का एक विशेष स्तर होना चाहिए।
इसलिए पिछले तमाम सालों से वो सिर्फ आर्थिक नीतियों को सिखने ,और जनता पर उन नीतियों का क्या प्रभाव जाता है ,,,उसे समझने के लिए जनता के बीच में काम कर रहा है।
उन्होंने व्यक्तिगत रूप से ये देखा की सोनिया और राहुल द्वारा मनमोहन सिंह को कठपुतली बनाने की बात तो दूर है ,,,सोनिया राहुल में इतनी समझ और सम्मान है की वो मनमोहन सिंह से हमेशा सीखने के मोड में रहते हैं।
मनमोहन सिंह को रोबोट बनाने या निर्देशित करने का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता।
रही बात मनमोहन सिंह जी की -
तो उनके बारे में बताया की कोन्ग्रेस्स में किसी भी नेता में इतनी हिम्मत ही नहीं की वो आर्थीक नीतियों के मामले में मनमोहन सिंह के सामने टिक तक सके।
अर्थ निति के बारे में मनमोहन सिंह से बातचीत करने का माद्दा सिर्फ जनार्दन द्विवेदी , चिदंबरम , प्रणब मुखर्जी , जयराम रमेश, मुरली देवड़ा और आनंद शर्मा जैसे कुछ गिने चुने नेताओ में ही था। (सनद रहें की इसमें राहुल गांधी तक शाम्मिल नहीं हैं )
मनमोहन सिंह एक बहुत ही कम बोलने वाले नेता थे , उनका अधिकाँश वक़्त इंटरनेशनल अर्थशास्त्र की दिशा और भारत में उसके पड़ने वाले प्रभावों का अध्यन करने में जाता था।
खाली समय में शायरी , और सूफ़ी साहित्य पढ़ते थे , उनकी उर्दू बहुत अच्छी है इसलिए वो हमेशा कुछ ना कुछ लिखते पढ़ते रहते थे।
अपने लिए किये जा रहे कुप्रचार से वो भली भाँती परिचित थे , उन्हें पता था की लोग उन्हें कठपुतली , मौन मोहन , रोबोट आदि कहतें थे।
लेकिन उनकी समझ और व्यक्तित्व इतना विशाल था की वो ऐसी बातें सुन कर सिर्फ मुस्कुराते रहते थे। जब भी उन्हें जवाब देने के लिए कहा जाता था वो सिर्फ हंस देतें थे।
और कहते थे की इतिहास की ईमानदारी पर भरोसा रखिये , इतिहास किसी को नहीं बख्शता , और आने वाली पीढ़ी पर मुझे पूरा भरोसा है की लाख कुप्रचार के बाद भी वो मेरे साथ न्याय करेगी।
उनका जवाब ना देने का सबसे बड़ा कारण ये था की वो उस स्तर तक जाकर आलोचना कर ही नहीं सकते थे जिस स्तर पर उनके विरोधी जाते थे।
की बार ऐसा हुआ की कांग्रेस के तमाम नेताओ ने कई बार उनकी नीतियों और फैंसलों पर अपनी असहमति जताई थी ,,लेकिन वही नेता दो साल बाद घूम कर वापिस उसी नीतियों पर उनसे क्षमा मांगते थे की सर आपने बिलकुल सही कहा था।
उनकी हर निति भारत की जनता पर अगले कई सालों तक पड़ने वाले प्रभाव के गहन अध्यन पर आधारित होती थी , इसलिए कांग्रेस के नेता भी कई बार उसे समझने में धोखा खा जाते थे।
याद कीजिये - मनमोहन सिंह जी ने कहा था की अगर मोई जी प्रधानमंत्री बने तो ये इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य होगा।
उनके इस स्टेटमेंट को लोग अधिकतर मोई जी के साम्प्रदायिक अजेंडे से जोड़ते हैं , ,,,लेकिन ऐसा नहीं है।
क्योंकि मनमोहन सिंह जी जब ऐसा कहते थे तो उसके अत्यंत गूढ़ अर्थ होते थे , उनको स्पष्ट रूप से मालूम था की अगर ये आदमी प्रधानमंत्री बन गया तो इस देश में आर्थिक सुनामी आ जायेगी , और ये आदमी फिर भी लोगो को बहका लेगा। जिसका असर ये होगा की देश में भुखमरों , बदहालों और गरीबो की एक बहुत बड़ी नयी दुनिया ही बन जायेगी . आर्थिक असामन्तायें अपने चरम पर पहुँच जाएंगी।
तभी उन्होंने कहा था की इस आदमी का प्रधामंत्री बनना इस देश की सबसे दुर्भाग्यपूर्ण घटना होगी।
स्पष्ट है की उनके भी काफी फेलियर रहे। जिस पर एक स्वास्थ्य बहस होनी चाहिए थी।
लेकिन जनता के प्रति उनके लगाव और पूंजीपतियों को खुली छूट ना देने की उनकी प्रवत्ति के चलते उनके खिलाफ एक प्रीप्लान दुष्प्रचार चलाया गया।
उस दुष्प्रचार को चलाने के दो प्रमुख उद्देश्य थे।
पहला - ये की मनमोंहंन सिंह को हटाया जाए ताकि पूँजी द्वारा शोषण की एक खुली लूट को गति दी जा सके।
दुसरा ये की - कांग्रेस को ये सबक सिखाया जा सके की अगली बार सत्ता में आने के बाद पूंजीपतियों को टैक्स में छूट , बैंको को अपने इशारों पर नचाने , और जनता की सब्सिडियों को खत्म करने के मॉडल में कोई अड़ंगा ना लगाया जाए।
रही बात मनमोहन सिंह को कठपुतली कहने की - तो मैं फिर से ये कहूंगा की कांग्रेस छोड़िये , विपक्ष और पूरे भारत में कोई ऐसा नेता नहीं की वो मनमोहन सिंह की किसी भी आर्थिक निति या नेतृत्व पर बहस तक कर सके।
उनके राज में भ्रष्टाचार हुए लेकिन अधिकाँश मामले कोर्ट में धराशायी हो गए ( कोल गेट , टू जी स्कैम आदि ), और जो हुए भी उनके आरोपियों को बिना किसी फेवर के जेल हुई।
चूँकि जनता राजनितिक रूप से इतनी अवेयर नहीं है और वह त्वरित फायदा और दुष्प्रचार में जल्दी फंसती हैं इसलिए विरोधियों ने बहुत ही सस्ते लेवल का दुष्प्रचार और हवा हवाई कैम्पेन चलाया और सफल भी हुए।
विरोधियों को भी पता था की हमारे पास भी कोई नया आर्थिक मॉडल नहीं है और जिस आर्थिक मकड़जाल में हम उतरने जा रहे हैं वो बहुत ही भयानक होगा।
लेकिन इसके साथ साथ उन्होंने जनता को भरमाने के लिए साम्प्रदायिकता , राष्ट्रवाद और धार्मिक नफरत व् भ्रमित करने के लिए सुचना के साधनो का जबरदस्त उपयोग किया , और आश्चर्जनक रूप से सफल रहे।
स्पष्तः व्यक्तिगत रूप से मैं मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों का कट्टर विरोधी रहा हूँ।
परन्तु उपरोक्त पूरी पोस्ट मेरे और उन कोंग्रेसी नेता की बातचीत का सारांश भर है।
थैंक्स
वाचस्पति शर्मा जी की पोस्ट
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मेरे एक करीबी रिश्तेदार हैं , जो की कांग्रेस में एक बहुत बड़े मंत्री पद पर हैं.
बड़े मतलब बहुत ही बड़े , उनकी पहुँच सीधे कांग्रेस के टॉप तीन नेताओ तक हैं।
एक बार बातचीत मेंउन्होंने बताया की कैसे बीजेपी ये नैरेटिव सैट करने में अप्रतयश्चित रूप से सफल रही की मनमोहन सिंह जी एक कठपुतली प्रधानमंत्री हैं।
चूँकि वो मनमोहन सिंह जी को शुरू से और राहुल और सोनिया को तो छोड़िये , वो राजीव गांधी तक को बचपन से देखतें आएं हैं और उनके स्वभाव और ककिरदार से भली भाँती परिचित हैं।
उन्होंने बताया की मनमोहन सिंह जी जैसे व्यक्तित्व को किसी भी तरीके और किसी भी प्रभाव से निर्देशित करना लगभग असंभव हैं।
कांग्रेस तो छोड़िये , पूरे देश और अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक कोई ऐसा अर्थशाष्त्री नहीं है जो उनकी किसी भी योजना या आर्थिक नीतियों को चैलेन्ज कर सके।
ये सही है की 90 के दशक के बाद से पूरी दुनिया अमेरिकी पूंजीवादी मॉडल पर चली है और मनमोहन सिंह भी इसके अपवाद नहीं है।
और इन्ही नीतियों को भारत में भी लागू करने के बावजूद उन्होंने पूंजीपतियों और जनता के बीच एक सामंजस्य बनाये रखा और पूंजीपतियों को उनकी मनमानी करने से काफी हद तक रोके रखा।
जो लोग कहतें हैं की मनमोहन सिंह जी सोनिया गांधी के इशारे पर काम करते थे या उनसे पूछ कर काम करते थे , उन्हें शायद ये तक नहीं मालूम की सोनिया जी को अर्थशास्त्र की ABCD समझाने वाले तक मनमोहन सिंह ही हैं।
कांग्रेस राज में तय की जाने वाली हर अर्थनीति को मनमोहन सिंह जी खुद रिव्यू करते थे , और सोनिया जी बाद में उस निति के अच्छे बुरे पॉइंट्स को देखकर सिर्फ अपनी राय रखती थी।
उन्होंने मनमोहन सिंह से कभी भी किसी निति के बारे में कोई सवाल तक नहीं किया , वरन वो तो उनसे कुछ विशिष्ट योजनाओ के लिए विनती ही करती थी।
उन्होंने मनमोहन सिंह से व्यक्तिगत रूप से मनरेगा और खाद्य सुरक्षा बिल को शश्क्त बनाने के लिए विनती करि थी।
उन्होंने मनमोहन सिंह जी से इच्छा जताई थी की आप इस बिल पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान दीजिये .
राहुल के बारे में उन्होंने बताया की -
राहुल खुद अपने आप में एक समझदार , पढ़ा लिखा , और बहुत ही अच्छा श्रोता है।
वो बिना सुने समझे किसी भी बात पर अपनी राय नहीं देता। और यही समझदारी के चले उसे खुद से ये भान है की मनमोहन सिंह जैसे व्यक्तित्व से अर्थशास्त्र तक पर अंतर्विरोध रखने के लिए ज्ञान का एक विशेष स्तर होना चाहिए।
इसलिए पिछले तमाम सालों से वो सिर्फ आर्थिक नीतियों को सिखने ,और जनता पर उन नीतियों का क्या प्रभाव जाता है ,,,उसे समझने के लिए जनता के बीच में काम कर रहा है।
उन्होंने व्यक्तिगत रूप से ये देखा की सोनिया और राहुल द्वारा मनमोहन सिंह को कठपुतली बनाने की बात तो दूर है ,,,सोनिया राहुल में इतनी समझ और सम्मान है की वो मनमोहन सिंह से हमेशा सीखने के मोड में रहते हैं।
मनमोहन सिंह को रोबोट बनाने या निर्देशित करने का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता।
रही बात मनमोहन सिंह जी की -
तो उनके बारे में बताया की कोन्ग्रेस्स में किसी भी नेता में इतनी हिम्मत ही नहीं की वो आर्थीक नीतियों के मामले में मनमोहन सिंह के सामने टिक तक सके।
अर्थ निति के बारे में मनमोहन सिंह से बातचीत करने का माद्दा सिर्फ जनार्दन द्विवेदी , चिदंबरम , प्रणब मुखर्जी , जयराम रमेश, मुरली देवड़ा और आनंद शर्मा जैसे कुछ गिने चुने नेताओ में ही था। (सनद रहें की इसमें राहुल गांधी तक शाम्मिल नहीं हैं )
मनमोहन सिंह एक बहुत ही कम बोलने वाले नेता थे , उनका अधिकाँश वक़्त इंटरनेशनल अर्थशास्त्र की दिशा और भारत में उसके पड़ने वाले प्रभावों का अध्यन करने में जाता था।
खाली समय में शायरी , और सूफ़ी साहित्य पढ़ते थे , उनकी उर्दू बहुत अच्छी है इसलिए वो हमेशा कुछ ना कुछ लिखते पढ़ते रहते थे।
अपने लिए किये जा रहे कुप्रचार से वो भली भाँती परिचित थे , उन्हें पता था की लोग उन्हें कठपुतली , मौन मोहन , रोबोट आदि कहतें थे।
लेकिन उनकी समझ और व्यक्तित्व इतना विशाल था की वो ऐसी बातें सुन कर सिर्फ मुस्कुराते रहते थे। जब भी उन्हें जवाब देने के लिए कहा जाता था वो सिर्फ हंस देतें थे।
और कहते थे की इतिहास की ईमानदारी पर भरोसा रखिये , इतिहास किसी को नहीं बख्शता , और आने वाली पीढ़ी पर मुझे पूरा भरोसा है की लाख कुप्रचार के बाद भी वो मेरे साथ न्याय करेगी।
उनका जवाब ना देने का सबसे बड़ा कारण ये था की वो उस स्तर तक जाकर आलोचना कर ही नहीं सकते थे जिस स्तर पर उनके विरोधी जाते थे।
की बार ऐसा हुआ की कांग्रेस के तमाम नेताओ ने कई बार उनकी नीतियों और फैंसलों पर अपनी असहमति जताई थी ,,लेकिन वही नेता दो साल बाद घूम कर वापिस उसी नीतियों पर उनसे क्षमा मांगते थे की सर आपने बिलकुल सही कहा था।
उनकी हर निति भारत की जनता पर अगले कई सालों तक पड़ने वाले प्रभाव के गहन अध्यन पर आधारित होती थी , इसलिए कांग्रेस के नेता भी कई बार उसे समझने में धोखा खा जाते थे।
याद कीजिये - मनमोहन सिंह जी ने कहा था की अगर मोई जी प्रधानमंत्री बने तो ये इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य होगा।
उनके इस स्टेटमेंट को लोग अधिकतर मोई जी के साम्प्रदायिक अजेंडे से जोड़ते हैं , ,,,लेकिन ऐसा नहीं है।
क्योंकि मनमोहन सिंह जी जब ऐसा कहते थे तो उसके अत्यंत गूढ़ अर्थ होते थे , उनको स्पष्ट रूप से मालूम था की अगर ये आदमी प्रधानमंत्री बन गया तो इस देश में आर्थिक सुनामी आ जायेगी , और ये आदमी फिर भी लोगो को बहका लेगा। जिसका असर ये होगा की देश में भुखमरों , बदहालों और गरीबो की एक बहुत बड़ी नयी दुनिया ही बन जायेगी . आर्थिक असामन्तायें अपने चरम पर पहुँच जाएंगी।
तभी उन्होंने कहा था की इस आदमी का प्रधामंत्री बनना इस देश की सबसे दुर्भाग्यपूर्ण घटना होगी।
स्पष्ट है की उनके भी काफी फेलियर रहे। जिस पर एक स्वास्थ्य बहस होनी चाहिए थी।
लेकिन जनता के प्रति उनके लगाव और पूंजीपतियों को खुली छूट ना देने की उनकी प्रवत्ति के चलते उनके खिलाफ एक प्रीप्लान दुष्प्रचार चलाया गया।
उस दुष्प्रचार को चलाने के दो प्रमुख उद्देश्य थे।
पहला - ये की मनमोंहंन सिंह को हटाया जाए ताकि पूँजी द्वारा शोषण की एक खुली लूट को गति दी जा सके।
दुसरा ये की - कांग्रेस को ये सबक सिखाया जा सके की अगली बार सत्ता में आने के बाद पूंजीपतियों को टैक्स में छूट , बैंको को अपने इशारों पर नचाने , और जनता की सब्सिडियों को खत्म करने के मॉडल में कोई अड़ंगा ना लगाया जाए।
रही बात मनमोहन सिंह को कठपुतली कहने की - तो मैं फिर से ये कहूंगा की कांग्रेस छोड़िये , विपक्ष और पूरे भारत में कोई ऐसा नेता नहीं की वो मनमोहन सिंह की किसी भी आर्थिक निति या नेतृत्व पर बहस तक कर सके।
उनके राज में भ्रष्टाचार हुए लेकिन अधिकाँश मामले कोर्ट में धराशायी हो गए ( कोल गेट , टू जी स्कैम आदि ), और जो हुए भी उनके आरोपियों को बिना किसी फेवर के जेल हुई।
चूँकि जनता राजनितिक रूप से इतनी अवेयर नहीं है और वह त्वरित फायदा और दुष्प्रचार में जल्दी फंसती हैं इसलिए विरोधियों ने बहुत ही सस्ते लेवल का दुष्प्रचार और हवा हवाई कैम्पेन चलाया और सफल भी हुए।
विरोधियों को भी पता था की हमारे पास भी कोई नया आर्थिक मॉडल नहीं है और जिस आर्थिक मकड़जाल में हम उतरने जा रहे हैं वो बहुत ही भयानक होगा।
लेकिन इसके साथ साथ उन्होंने जनता को भरमाने के लिए साम्प्रदायिकता , राष्ट्रवाद और धार्मिक नफरत व् भ्रमित करने के लिए सुचना के साधनो का जबरदस्त उपयोग किया , और आश्चर्जनक रूप से सफल रहे।
स्पष्तः व्यक्तिगत रूप से मैं मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों का कट्टर विरोधी रहा हूँ।
परन्तु उपरोक्त पूरी पोस्ट मेरे और उन कोंग्रेसी नेता की बातचीत का सारांश भर है।
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