"चोर चोर होता है , अतिथि अतिथि।
"चोर चोर होता है , अतिथि अतिथि। सार्स-सीओवी 2 विषाणु को आप चोर और अतिथि के बीच में समझिए।" अंकलजी को समझाया जाता है।
"कोई विषाणु चोर और अतिथि दोनों के गुण कैसे रख सकता है ? थोड़ा समझाकर बताओ।" वे पूछते हैं।
"विषाणु क्या है ? क्या यह जीवित है ?"
"सुना यही है कि यह न जीवित है और न मृत ? इस समझ में भी दुविधा रहा करती है। कोई जीवित और मृत दोनों न हो ,ऐसा कैसे हो सकता है ?"
"जीवन की परिभाषा वहाँ से शुरू होती है , जहाँ रसायन-विज्ञान की सरहद समाप्त होती है और जीव-विज्ञान की शुरू। रासायनिक अणु जीवन की परिभाषा से पहले पड़ जाते हैं , कोशिका से पूर्व। कोशिका जीवन की सबसे छोटी इकाई कही जाती है। यानी जो-कुछ भी कोशिका से कम या छोटा है , वह जीवन की परिभाषा से छोटा है। जो जीवन की परिभाषा से छोटा है , वह रसायन हो सकता है अथवा रसायन और कोशिका के बीच में। बस विषाणु यहीं स्थित है : रसायन-शास्त्र और जीव-विज्ञान की देहरी पर। वह रसायन की परिभाषा से आगे तो बढ़ आया है ,किन्तु जीवन की इकाई 'कोशिका' तक नहीं पहुँच सका। सो वह सजीव-निर्जीव-सीमा पर स्थित है।"
"इस सीमा-स्थिति के मायने क्या हैं ?"
"इसके मायने ये हैं कि विषाणु निर्जीविता और सजीविता , दोनों के लक्षण स्थिति के अनुरूप प्रदर्शित कर सकता है। अलग-अलग परिवेश में जीवित-निर्जीव बर्ताव तथानुरूप करता हुआ।"
"और वह चोर और अतिथि दोनों के गुणधर्म वाली बात ?"
"जी। चोर आपके घर में बिना आपकी इच्छा के घुसता है , उसके आने से ( बाद में ) आपको कष्ट होता है। वह चोरी करता है और चम्पत हो जाता है। वह घर का अधिक ध्वंस बहुधा नहीं करता। ( या कई बार कर भी देता है। ) अतिथि किन्तु आमन्त्रित अथवा अनामन्त्रित जैसा भी हो , सुखकारी होता है। वह न घर का ध्वंस करता है और न आपकी इच्छा के विरोध में कोई बर्ताव। अब सार्स-सीओवी 2 विषाणु को समझिए। एक ऐसा व्यक्ति जो आपकी इच्छा के बिना आपके घर में घुस आया है , आपकी सारी सेवाएँ ले रहा है और घर में तोड़फोड़ भी कर रहा है। वह वहाँ रहते हुए दस हज़ार बच्चे पैदा करता है और इससे पहले कि आप जान पाएँ , घर की ऐसी-तैसी करके चल देता है। किन्तु इस ध्वंस की भी एक सीमा उसने तय कर रखी है।"
"बड़ी कृपा की। पर यह सार्स-सीओवी 2 विषाणु अतिथि-जैसा कैसे हुआ ?"
"अतिथि की तरह इसका उद्देश्य घर की सुविधाओं का भोग करना है , किन्तु सम्पूर्ण ध्वंस करना नहीं। अगर यह घर का सम्पूर्ण ध्वंस करने लगे , तो सभी को मार देगा। यह इबोला , सार्स अथवा मर्स की तरह अगर अधिक मृत्युकारी हुआ , तब अन्ततः इसके संचार में ही समस्या आने लगेगी। जो विषाणु इतना मारक हो कि अपने आतिथेय को ही मारता चला जाए , वह अगले आतिथेय में कैसे जा सकेगा ? इसलिए विषाणु की मारक क्षमता अगर कम है , तो यह उसके हित में काम कर सकती है। आतिथेय को मारो नहीं , केवल उसका शोषण करो। वह मरे नहीं , केवल उसका दोहन हो।"
"आतिथेय की मृत्यु विषाणु के लिए हितकारी नहीं अर्थात् ?"
"बहुधा नहीं।"
"मानव का प्रतिरक्षा-तन्त्र विषाणु को मार क्यों नहीं पा रहा ? हमारे सैनिक क्या घुइयाँ छील रहे हैं ?"
"सैनिक दो क़िस्म के हैं। पहले जो सबको मारते हैं बिना विशिष्ट ट्रेनिंग के। ये सैनिकों का पहली टोली है। दूसरे सैनिक ट्रेनिंग के बाद तैयार होते हैं। ये दूसरी टोली है। पहली टोली ढंग से इस नये विषाणु को मार नहीं पा रही , दूसरे सबमें तैयार नहीं हो पा रही। जिनमें ये दोनों टोलियाँ मिलकर सही काम कर ले रही हैं , वहाँ रोगी की जान बच जा रही है। जहाँ दोनों टोलियाँ कम काम कर रही हैं अथवा ज़्यादा , वहाँ रोगी की मृत्यु हो जा रही है।"
"इस तरह देखा जाए तो दोनों टोलियाँ ज़्यादातर रोगियों में दुश्मन से निबट ले रही हैं। हैं न ?"
"बिलकुल। इसलिए यह न कहिए कि हमारा प्रतिरक्षा-तन्त्र क्या घुइयाँ छील रहा है ! वह बहुत-कुछ कर रहा है और बहुत-सही कर रहा है। बेचारा 5 % में चूक रहा है ( कम-ज़्यादा प्रतिक्रिया देता हुआ ) और वहीं मौतें हो रही हैं। दुनिया में वैक्सीनों के निर्माण की जितनी यह मारामारी है न , यह दूसरी टोली के सैनिकों की बेहतर ट्रेनिंग की तैयारी के लिए है। टीका लगाओ , विशिष्ट ट्रेनिंग देकर दूसरी टोली के बेहतर सैनिक तैयार करो और पाँच प्रतिशत मौतों को भी एकदम ग़ायब कर दो।"
"और एंटीवायरल दवाएँ क्या करेंगी ?"
"दवाएँ सेना की दोनों टोलियों की मदद करेंगी। शरीर में घुसना रोककर , नयी प्रतियों का निर्माण रोककर अथवा इन प्रतियों का बहिर्गमन रोक कर। लेकिन एक बात जान लीजिए। विषाणुओं पर विजय की वैक्सीन-निर्माण व प्रयोग वाली कहानियाँ आप पढ़ेंगे , उसमें दूसरी टोली के सैनिकों के ट्रेनिंग की ही कथा है। टीका सैनिकों की ट्रेनिंग का तरीक़ा है कि देखो 'यह दुश्मन है , इसे पहचान लो' ! बिना इस विशिष्ट पहचान वाली ट्रेनिंग के हम विषाणुओं से ढंग से लड़ नहीं सकते , जीतना तो दूर की बात है।
अंकलजी सार्स-सीओवी 2 को समझने लगे हैं। उनके मन में चोर और अतिथि के मिलेजुले स्वरूप की कल्पना आकार ले रही है। कितनी --- मैं कह नहीं सकता। पर वे अन्ततः एक ही बात कहते हैं : दूसरी टोली को प्रशिक्षण देकर तैयार करने वाली वैक्सीन-डिफेन्स-एकेडमी ( वीडीए ) जल्दी खुले और काम आरम्भ हो।
"कोई विषाणु चोर और अतिथि दोनों के गुण कैसे रख सकता है ? थोड़ा समझाकर बताओ।" वे पूछते हैं।
"विषाणु क्या है ? क्या यह जीवित है ?"
"सुना यही है कि यह न जीवित है और न मृत ? इस समझ में भी दुविधा रहा करती है। कोई जीवित और मृत दोनों न हो ,ऐसा कैसे हो सकता है ?"
"जीवन की परिभाषा वहाँ से शुरू होती है , जहाँ रसायन-विज्ञान की सरहद समाप्त होती है और जीव-विज्ञान की शुरू। रासायनिक अणु जीवन की परिभाषा से पहले पड़ जाते हैं , कोशिका से पूर्व। कोशिका जीवन की सबसे छोटी इकाई कही जाती है। यानी जो-कुछ भी कोशिका से कम या छोटा है , वह जीवन की परिभाषा से छोटा है। जो जीवन की परिभाषा से छोटा है , वह रसायन हो सकता है अथवा रसायन और कोशिका के बीच में। बस विषाणु यहीं स्थित है : रसायन-शास्त्र और जीव-विज्ञान की देहरी पर। वह रसायन की परिभाषा से आगे तो बढ़ आया है ,किन्तु जीवन की इकाई 'कोशिका' तक नहीं पहुँच सका। सो वह सजीव-निर्जीव-सीमा पर स्थित है।"
"इस सीमा-स्थिति के मायने क्या हैं ?"
"इसके मायने ये हैं कि विषाणु निर्जीविता और सजीविता , दोनों के लक्षण स्थिति के अनुरूप प्रदर्शित कर सकता है। अलग-अलग परिवेश में जीवित-निर्जीव बर्ताव तथानुरूप करता हुआ।"
"और वह चोर और अतिथि दोनों के गुणधर्म वाली बात ?"
"जी। चोर आपके घर में बिना आपकी इच्छा के घुसता है , उसके आने से ( बाद में ) आपको कष्ट होता है। वह चोरी करता है और चम्पत हो जाता है। वह घर का अधिक ध्वंस बहुधा नहीं करता। ( या कई बार कर भी देता है। ) अतिथि किन्तु आमन्त्रित अथवा अनामन्त्रित जैसा भी हो , सुखकारी होता है। वह न घर का ध्वंस करता है और न आपकी इच्छा के विरोध में कोई बर्ताव। अब सार्स-सीओवी 2 विषाणु को समझिए। एक ऐसा व्यक्ति जो आपकी इच्छा के बिना आपके घर में घुस आया है , आपकी सारी सेवाएँ ले रहा है और घर में तोड़फोड़ भी कर रहा है। वह वहाँ रहते हुए दस हज़ार बच्चे पैदा करता है और इससे पहले कि आप जान पाएँ , घर की ऐसी-तैसी करके चल देता है। किन्तु इस ध्वंस की भी एक सीमा उसने तय कर रखी है।"
"बड़ी कृपा की। पर यह सार्स-सीओवी 2 विषाणु अतिथि-जैसा कैसे हुआ ?"
"अतिथि की तरह इसका उद्देश्य घर की सुविधाओं का भोग करना है , किन्तु सम्पूर्ण ध्वंस करना नहीं। अगर यह घर का सम्पूर्ण ध्वंस करने लगे , तो सभी को मार देगा। यह इबोला , सार्स अथवा मर्स की तरह अगर अधिक मृत्युकारी हुआ , तब अन्ततः इसके संचार में ही समस्या आने लगेगी। जो विषाणु इतना मारक हो कि अपने आतिथेय को ही मारता चला जाए , वह अगले आतिथेय में कैसे जा सकेगा ? इसलिए विषाणु की मारक क्षमता अगर कम है , तो यह उसके हित में काम कर सकती है। आतिथेय को मारो नहीं , केवल उसका शोषण करो। वह मरे नहीं , केवल उसका दोहन हो।"
"आतिथेय की मृत्यु विषाणु के लिए हितकारी नहीं अर्थात् ?"
"बहुधा नहीं।"
"मानव का प्रतिरक्षा-तन्त्र विषाणु को मार क्यों नहीं पा रहा ? हमारे सैनिक क्या घुइयाँ छील रहे हैं ?"
"सैनिक दो क़िस्म के हैं। पहले जो सबको मारते हैं बिना विशिष्ट ट्रेनिंग के। ये सैनिकों का पहली टोली है। दूसरे सैनिक ट्रेनिंग के बाद तैयार होते हैं। ये दूसरी टोली है। पहली टोली ढंग से इस नये विषाणु को मार नहीं पा रही , दूसरे सबमें तैयार नहीं हो पा रही। जिनमें ये दोनों टोलियाँ मिलकर सही काम कर ले रही हैं , वहाँ रोगी की जान बच जा रही है। जहाँ दोनों टोलियाँ कम काम कर रही हैं अथवा ज़्यादा , वहाँ रोगी की मृत्यु हो जा रही है।"
"इस तरह देखा जाए तो दोनों टोलियाँ ज़्यादातर रोगियों में दुश्मन से निबट ले रही हैं। हैं न ?"
"बिलकुल। इसलिए यह न कहिए कि हमारा प्रतिरक्षा-तन्त्र क्या घुइयाँ छील रहा है ! वह बहुत-कुछ कर रहा है और बहुत-सही कर रहा है। बेचारा 5 % में चूक रहा है ( कम-ज़्यादा प्रतिक्रिया देता हुआ ) और वहीं मौतें हो रही हैं। दुनिया में वैक्सीनों के निर्माण की जितनी यह मारामारी है न , यह दूसरी टोली के सैनिकों की बेहतर ट्रेनिंग की तैयारी के लिए है। टीका लगाओ , विशिष्ट ट्रेनिंग देकर दूसरी टोली के बेहतर सैनिक तैयार करो और पाँच प्रतिशत मौतों को भी एकदम ग़ायब कर दो।"
"और एंटीवायरल दवाएँ क्या करेंगी ?"
"दवाएँ सेना की दोनों टोलियों की मदद करेंगी। शरीर में घुसना रोककर , नयी प्रतियों का निर्माण रोककर अथवा इन प्रतियों का बहिर्गमन रोक कर। लेकिन एक बात जान लीजिए। विषाणुओं पर विजय की वैक्सीन-निर्माण व प्रयोग वाली कहानियाँ आप पढ़ेंगे , उसमें दूसरी टोली के सैनिकों के ट्रेनिंग की ही कथा है। टीका सैनिकों की ट्रेनिंग का तरीक़ा है कि देखो 'यह दुश्मन है , इसे पहचान लो' ! बिना इस विशिष्ट पहचान वाली ट्रेनिंग के हम विषाणुओं से ढंग से लड़ नहीं सकते , जीतना तो दूर की बात है।
अंकलजी सार्स-सीओवी 2 को समझने लगे हैं। उनके मन में चोर और अतिथि के मिलेजुले स्वरूप की कल्पना आकार ले रही है। कितनी --- मैं कह नहीं सकता। पर वे अन्ततः एक ही बात कहते हैं : दूसरी टोली को प्रशिक्षण देकर तैयार करने वाली वैक्सीन-डिफेन्स-एकेडमी ( वीडीए ) जल्दी खुले और काम आरम्भ हो।

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