वैज्ञानिकों ने बताया कोरोना वायरस के चपेट में आने वाले लोगों की ये दो चीजें सबसे पहले होती हैं प्रभावित

नई दिल्ली। कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया में कहर मचा रखा है। अब तक लगभग दो लाख लोगों की इस वायरस के संक्रमण से मौत हो चुकी है। दुनियाभर की रिसर्च लैब इस वायरस का टीका और दवा खोजने में लगी हुई हैं मगर अभी तक किसी को कामयाबी नहीं मिल पाई है। अमेरिका समेत दुनियाभर के तमाम देश जल्द से जल्द इस वायरस का इलाज खोजने में अपनी टीम को लगाए हुए हैं।
वैज्ञानिक दिनरात कोरोना वायरस से बचाव के लिए टीके की खोज में रिसर्च कर रहे हैं। कभी किसी तरह से इलाज करने की बात कही जा रही है तो कभी किसी तरह से मगर किस चीज से इस वायरस का पूरी तरह से खात्मा हो पाएगा ये अभी तक किसी देश के वैज्ञानिक नहीं कह पाए हैं। अब देखना ये है कि वैज्ञानिक इस वायरस की काट के लिए टीका कब तक खोज लेते हैं।
खैर इस बीच वैज्ञानिकों की एक टीम ने ये पहचान करने में जरूरी कामयाबी हासिल कर ली है कि वायरस किस तरह से नाक के रास्ते हमारे शरीर के भीतरी अंगों में प्रवेश करता है और नुकसान पहुंचाना शुरू करता है। ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने इसका पता लगा लिया है। वैज्ञानिकों को नाक में उन दो खास प्रकार की कोशिकाओं (सेल्स) की पहचान करने में बड़ी सफलता हाथ लगी है, जो संभवत: कोरोना वायरस से सबसे पहले संक्रमित होती हैं। ये कोशिकाएं शरीर में कोरोना के दाखिल होने के लिए प्रवेश द्वार के तौर पर काम कर सकती हैं।
ब्रिटेन के वेलकम सेंजर इंस्टीट्यूट और नीदरलैंड की यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर के शोधकर्ताओं ने नाक में गाब्लेट और सिलिएटेड सेल्स की खोज की। इन दोनों कोशिकाओं में उच्च स्तर पर इंट्री प्रोटीन होते हैं। इन प्रोटीन के उपयोग से कोरोना वायरस (कोविड-19) हमारे शरीर की कोशिकाओं में दाखिल होता है। उन्होंने कहा कि इन कोशिकाओं की पहचान होने से कोरोना संक्रमण की उच्च दर की व्याख्या करने में मदद मिल सकती है।
नेचर मेडिसिन पत्रिका में छपे अध्ययन से यह भी जाहिर होता है कि आंख, आंत, किडनी और लिवर समेत शरीर के दूसरे कुछ अंगों में भी इंट्री प्रोटीन होते हैं। अध्ययन में यह अनुमान भी लगाया गया है कि इंट्री प्रोटीन दूसरे इम्यून सिस्टम जीन के साथ कैसे नियंत्रित होते हैं। इन निष्कर्षों से कोरोना की रोकथाम के लिए नए लक्ष्यों को साधने के साथ उपचारों के विकास की राह खुल सकती है।
शोधकर्ताओं ने बताया कि कोविड-19 रोग की वजह बनने वाले वायरस को सार्स-कोवी-2 नाम से जाना जाता है। वायरस से सबसे पहले संक्रमित होने वाली नाक की कोशिकाओं की पहले पहचान नहीं हो पाई थी। वेलकम सेंजर इंस्टीट्यूट के शोधकर्ता वारडोन सुंग्नेक ने कहा, ‘हमने रिसेप्टर प्रोटीन एसीई2 और टीएमपीआरएसएस2 पाए हैं, जो नाक समेत कई अंगों की कोशिकाओं में मौजूद होते हैं। ये प्रोटीन सार्स-कोवी-2 को सक्रिय कर सकते हैं।’
इसी वजह से जब कोरोना वायरस की पहचान हुई तो सभी को इससे बचाव के लिए अपने नाक और मुंह को ढककर रखने के लिए कहा गया क्योंकि जो लोग भी इसकी चपेट में आ रहे थे वो अपना नाक और मुंह खुला होने की वजह से संक्रमित हो रहे थे। फिर ये सिलसिला आगे तक चलता जा रहा था जिससे संक्रमित होने वालों की संख्या अब लाखों में पहुंच चुकी है। इसी वजह से तमाम देशों की सरकारों ने अपने यहां लॉकडाउन किया जिससे वायरस के संक्रमण को रोका जा सके।
लॉकडाउन का ही नतीजा है कि भारत के तमाम राज्यों में कोरोना के मरीजों की संख्या कम है। जिन प्रदेशों में इसके मरीज अधिक पाए जा रहे हैं वहां विदेशी यात्रियों का आना-जाना अधिक है, इनके माध्यम से भी दूसरे देशों से कोरोना का संक्रमण भारत पहुंचा जिसका खामियाजा वहां के लोगों को भुगतना पड़ रहा है।
खैर अब हर देश के वैज्ञानिकों के पास फिलहाल इस वायरस का टीका खोजने की ही जिम्मेदारी है, वो रात दिन तमाम तरह से रिसर्च करके इसका टीका बनाने के प्रयास में लगे हुए हैं। जो भी देश इस संक्रमण का टीका खोजने में कामयाबी हासिल कर लेगा इस समय उसे दुनियाभर में पूजा जाएगा। अमेरिका जैसा देश इस तरह
के टीके को हाथोंहाथ खरीदने को आतुर है।
अमेरिका समेत अन्य कुछ देशों में मेडिकल सुविधाएं दुनिया के उच्चतर स्तरों में शुमार है उसके बावजूद वहां पर हजारों की संख्या में लोगों की मौत हो चुकी है, इससे एक बात ये भी सिद्ध हो गई कि इस वायरस के सामने एडवांस मेडिकल सुविधाएं भी फीकीं ही है, यदि पहले से बचाव नहीं किया गया तो लोगों की जान जाना तय है। वो इन देशों में देखने को मिल चुका है।  

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Yeh vidhi ka vidhan hai.