pets and virus

लेकिन वह यह भूल रहा था कि जब जन्तु पालतू हो जाता है , तब वह अपनी प्रकृत पाशविकता से हटकर पालक मनुष्यता की ओर आने का प्रयास करता है। मनुष्यगत अच्छाइयाँ ही नहीं , बुराइयाँ भी सोखने लगता है। पला हुआ जानवर पूरी तरह जानवर नहीं रहता ; वह मिश्रित गुणधर्म वाला हो जाता है। उसी तरह जिस तरह पालने वाला मनुष्य पूरी तरह मनुष्य नहीं रहता , वह पशुता की ओर धीरे-धीरे खिंचने लगता है। पशुता की बुराइयाँ ही नहीं , अच्छाइयाँ भी। पशु-मनुष्य-संसर्ग से दोनों में बहुत-कुछ अदला-बदली करता है। एक-दूसरे से अनेक आचार व व्यवहार लिये जाते हैं। भाषा के मीठे बोलों से लेकर विषाणु तक ..."
( कहानी : लाॅकडाउन के बाद ... )
Arun Dev is with Skand Shukla and 5 others.
लॉकडाउन के बाद
स्कन्द शुक्ल.
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डॉ. स्कन्द शुक्ल (MBBS, MD, DM : Rheumatologist, Immunologist) हिंदी के पाठकों के सुपरिचित लेखक हैं. रोगों की जटिलता, बचाव और निदान को सृजनात्मक भाषा में जिस तरह से वो प्रस्तुत करते हैं, वह अप्रतिम तो है ही उनकी प्रसिद्धि का कारण भी है. कविता-कहानी के साथ-साथ उनके दो उपन्यास भी प्रकाशित हैं- 'परमारथ के कारने' और 'अधूरी औरत'
कोरोना काल में मनुष्य क़ैद है, उसकी सामाजिक जटिलता भले ही स्थगित हो मानसिक जटिलता बढ़ी है. चिकित्सक अगर लेखक भी हो तो वह इसे किस तरह देखता है और लिखता है ? स्कन्द शुक्ल ने इसे एक दिलचस्प पर कारुणिक आख्यान में बदल दिया है.
पढ़ते हैं.
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Skand Shukla
( हर 'प्रोटीन' को एक समझना भूल है। पुराना लेख। )
" मेरा सी-रिएक्टिव प्रोटीन बढ़ा हुआ है। तो क्या मुझे प्रोटीन भोजन में लेना बन्द कर देना चाहिए ? " एक रोगी पैकेजवाली जाँचों में से एक की तरफ़ इशारा करते हुए कहता है।
रोगी प्रोटीन को अपना शत्रु समझ बैठा है। जहाँ प्रोटीन शब्द सुना नहीं , कि आत्मा से आवाज़ आयी 'इसे बन्द करो तुरन्त'। हर जोड़ों की बीमारी को खींचखाँच कर डॉक्टर और रिश्तेदार प्रोटीन तक इस तरह ले जाते हैं कि लिनस पाउलिंग की आत्मा कहीं अपना माथा पीटती है। ( पाउलिंग ने ही प्रोटीन की आणविक संरचना का पता लगाया था। )
संसार के हर व्यक्ति जो यह जानना ज़रूरी है कि प्रोटीन के बिना उसका अस्तित्व ही नहीं हो सकता। प्रोटीन से शरीर का निर्माण हुआ है , उसी से उसकी नित्य वृद्धि होती है , उसी से उसके घाव भरते हैं। तमाम कीटाणुओं से लड़ने में भी प्रोटीन नाना प्रकार से सहायता प्रदान करते हैं। इनके अलावा भी प्रोटीन ऐसी बहुतेरे कार्य करते हैं , जिन्हें यहाँ समेटना अनावश्यक रूप से दुष्कर है।
'सी-रिएक्टिव-प्रोटीन' भी निश्चित रूप में प्रोटीन का एक प्रकार है। इसका सम्बन्ध शरीर में चल रहे प्रदाह यानी इन्फ़्लेमेशन से है। कहीं आग लगी है , इसीलिए धुआँ आँख-नाक में भर रहा है। किन्तु आप प्रोटीन न खाकर सी-रिएक्टिव प्रोटीन को कम नहीं कर पाएँगे। और अगर आपने धुएँ को कम भी कर लिया , तो क्या आग जलना बन्द हो जाएगी ?
बात सीधी और स्पष्ट है। सी-रिएक्टिव प्रोटीन के इशारे को पकड़िए। देखिए कि वह क्या इंगित कर रहा है। ढूँढ़िए कि जिस्म में आग कहाँ दहक रही है। उस दहन का शमन कीजिए , धुआँ अपने-आप थम जाएगा। रोग पर प्रहार ही ख़ून की इस जाँच को सामान्य कर देगी।
और हाँ , प्रोटीन खाना उसी तरह से जारी रखिए , जिस तरह से आपकी वय-लिंग-गतिविधि के व्यक्ति को खाना चाहिए। एक ही अपवाद है : जब तक कोई डॉक्टर आपसे प्रोटीन-सेवन कम करने को न कहे ( बन्द करने को तो कोई कह ही नहीं सकता ! )।
फिर वही बात। किसी गठिया-रोग का और यूरिक एसिड का भोजन में प्रोटीन-सेवन से कोई रिश्ता है ही नहीं !
--- स्कन्द।
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यदि कमजोर प्रतिरक्षा तंत्र वालों के कोविड से प्रभावित होने की संभावना ज्यादा है तो गरीब देशों में जहाँ कुपोषितों की आबादी अधिक है और भारत में भी, यह बीमारी का विकराल रूप उस तरह का क्यों नहीं देखने को मिला जितना कि समृद्ध देशों में। क्या अपनी गरीबी और नियमित गंदगी में रहने के कारण हमारे शरीर ने अदृश्य सुरक्षा कवच तो तैयार नहीं कर लिया है।
कृपया समझाएं।
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कोविड-19 : वे लोग क्या करें जिनका प्रतिरक्षा-तन्त्र किसी वजह से क्षीण है ?
चिकित्सा-शब्दावली में एक विशेषण 'इम्यूनोकॉम्प्रोमाइज़्ड' चलता है। ऐसा व्यक्ति जिसका प्रतिरक्षा-तन्त्र जन्म से अथवा बाद में किसी कारण से कमज़ोर रहा हो।/अथवा हो गया हो , उसे इम्यूनोकॉम्प्रोमाइज़्ड इम्यून सिस्टम वाला व्यक्ति कहा जाता है। ऐसे अनेक लोग हमारे बीच रह रहे हैं , वे हमारे परिवारों और समाजों का हिस्सा हैं। आज जब कोविड-19 से सारी दुनिया जूझ रही है , तब इन क्षीण प्रतिरक्षक-तन्त्र वाले रोगियों की सुरक्षा को समझना ज़रूरी हो होता है।
प्रतिरक्षा-तन्त्र में न कोई एक कोशिका है और न एक रसायन। यह तो अनेकानेक प्रकार की कोशिकाओं व रसायनों के जमावड़े का नाम है। जिस तरह से लोग साधारणतः कुछ खा लेने या न खाने लेने से इम्यूनिटी बढ़ाने की चाह रखते हैं , वे अतिसाधारण सोच है और उसे सही नहीं समझना चाहिए। संसार का कोई डॉक्टर किसी को यह नहीं बता सकता कि अमुक विशिष्ट काम करने से आपकी इम्यूनिटी बढ़ जाएगी। कारण कि प्रतिरक्षा को स्वस्थ रखने के सभी मन्त्र वही हैं , जो आदिकाल से बड़े-बूढ़े बताया करते हैं : सन्तुलित आहार , सम्यक् निद्रा , तनाव-मुक्ति , नशा-मुक्ति , सम्यक् व्यायाम और सकारात्मक सोच। बस ! लेकिन ये सभी बातें सभी के लिए हैं , सामान्य हैं। इनमें कोई विशिष्टता निहित है ही नहीं।
इन बातों पर ध्यान देने के बावजूद भी कोई व्यक्ति इम्यूनोकॉम्प्रोमाइज़्ड हो सकता है। यह सब करने के बाद भी उसकी दैहिक सेना ठीक से कीटाणुओं व कैंसर से न लड़ पाये। कारण कि इम्यून सिस्टम के स्वास्थ्य का निर्धारण व्यक्ति की जेनेटिक्स भी करती है। यानी बुरे जीन लेकर अगर आप पैदा हुए और आपने जीवन ऊटपटांग ढंग से जिया , तब वह कोढ़-में-खाज जैसा हो गया ! विरासत में प्रतिरक्षा-तन्त्र के बुरे जीन मिले थे , आपने भोजन-नींद-व्यायाम-नशा-तनाव पर ध्यान न देकर और बिगाड़ लिया उसे ! लेकिन फिर यह भी सम्भव है कि व्यक्ति एकदम सही और सुचारु जीवन जीता रहा है , फिर भी उसके जीनों के कारण उसका प्रतिरक्षा-तन्त्र कमज़ोर रहा करता हो और उसे बार-बार संक्रमण होते रहते हों। कारण कि जीनों में बदलाव अभी चिकित्सा-विज्ञान में किसी तरह सम्भव हो ही नहीं पाया है।
अनेक बच्चे ( व अन्य युवा-प्रौढ़ ) जन्म से क्षीण प्रतिरक्षा-तन्त्र लेकर पैदा हुए हैं। ये प्रायमरी इम्युनोडेफिशिएंसी से ग्रस्त हैं। अधिसंख्य लोगों का प्रतिरक्षा-तन्त्र पर्यावरण में मौजूद हानिकारक रसायनों कीटनाशकों , भारी धातुओं ( सीसा-आर्सेनिक-पारा इत्यादि ) , पेट्रोलियम-उत्पादों व हवा में मौजूद विषैले रसायनों के कारण क्षीण हो रहा है। न जाने कितने लोग ठीक से भोजन नहीं पा रहे , शराब-धूमपान के कारण भी अनेक की इम्यूनिटी कमज़ोर हो रही है। एचआईवी जैसे विषाणुओं व अनेक दवाओं के कारण भी ढेर सारे लोग क्षीण प्रतिरक्षा के साथ कोविड-19 के दौरान जीवन जी रहे हैं। अनेक का अंग-प्रत्यारोपण हुआ है , कई ऑटोइम्यून रोगों से ग्रस्त हैं और उनकी दवाएँ ले रहे हैं।
क्या इम्यूनोकॉम्प्रोमाइज़्ड लोगों में कोविड-19 संक्रमण अधिक गम्भीर होगा ? क्या वे संक्रमित होकर अधिक लक्षणयुक्त हो जाएँगे ? अथवा क्या उनके वेंटिलेटर पर जाने और मरने की आशंका अधिक है ? इन प्रश्नों के सीधे-सीधे उत्तर दे पाना अभी विज्ञान के लिए सम्भव नहीं। एक ओर तो यह देखने को मिल रहा है कमज़ोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों में कोविड-19 का संक्रमण होने की आशंका अधिक रही है और उनमें यह संक्रमण गम्भीर भी ज़्यादा हो रहा है , तो दूसरी ओर उलटा भी देखने को मिला है। यानी जिन लोगों का इम्यून सिस्टम कमज़ोर है , वे संक्रमित होने के बावजूद लक्षणहीन या मामूली लक्षणयुक्त रहे हैं और आसानी से इस बीमारी से बच निकले हैं , जबकि उनके आसपास के लोगों में लक्षण अधिक देखने को मिले हैं। यद्यपि चिकित्सा की मुख्यधारा का मानना यही है कि क्षीण प्रतिरक्षा-तन्त्र वाले रोगियों को कोविड-19 से संक्रमित और गम्भीर लक्षणग्रस्त होने की आशंका सामान्य लोगों से अधिक है।
यह विरोधाभास दो बातें सामने लाता है। पहली यह कि कोविड-19 में पैदा होने वाले गम्भीर लक्षण केवल विषाणु के कारण नहीं पैदा हो रहे। विषाणु और प्रतिरक्षा-तन्त्र लड़ते हैं और फेफड़े व शरीर के अन्य अंग इन-दोनों की लड़ाई में व्यापक रूप से क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। ( यह दो हाथियों की लड़ाई में घास के कुचले जाने की स्थिति है और इसपर पहले लिखा है। ) दूसरा यह कि क्षीण प्रतिरक्षा-तन्त्र वाले रोगियों को अपने डॉक्टरों से पूछकर यथासम्भव भोजन-निद्रा-तनाव-नशा-सार्थक सोच पर काम करना चाहिए। बचाव के सभी उपाय इम्यूनोकॉम्प्रोमाइज़्ड लोगों पर भी लागू हैं। सोशल ( फ़िज़िकल ) डिस्टेंसिंग, हाथों को ठीक से साबुन-पानी से धोना , सार्वजनिक जगहों पर मास्क लगाना और कम-से-कम लोगों के सम्पर्क में आना। हर रोकथाम के उपाय को आम जन से अधिक गम्भीरता से लेना। प्रतिरक्षा को दुरुस्त रखने के सभी सामान्य उपाय करना। पर उन दवाओं के बारे में क्या , जो इम्यून सिस्टम को कमज़ोर करती / कर सकती हैं ? अगर वे प्रतिरक्षा क्षीण करने वाली किन्हीं दवाओं पर हैं , तो इसकी पूरी उम्मीद है कि डॉक्टर उन्हें दवाएँ बन्द करने को न कहें। ( ग्लूकोकॉर्टिकॉयड ( जिन्हें आम लोग स्टेरॉयड कहते हैं ) या ऐसी अन्य अनेक दवाओं का सेवन करने से कुछ कोविड-रोगियों के लक्षणों को नियन्त्रित करने में भी मदद मिली है और दूसरी ओर अनेक रोगी इस विषाणु को अधिकाधिक फैलाने वाले सुपरस्प्रेडर भी बन गये हैं। ) दवाओं को बन्द करने से होने वाला नुकसान प्रत्यक्ष है , कोविड-19 हो-न-हो और होने पर भी पता नहीं कितने गम्भीर लक्षण पैदा करे। स्पष्ट और प्रत्यक्ष समस्या के प्रति लापरवाही करके भविष्यगत आशंकित समस्या पर ध्यान देना कभी समझदारी नहीं कही जा सकती।
ऐसे में निर्णय डॉक्टरों को करना है : उन्हें , जो रोगियों को देख रहे हैं। व्यक्तिगत स्तर पर। कोई सार्वजनिक एकरूप दिशा-निर्देश नहीं हैं : विज्ञान तो फिर अभी शोध में लगा ही हुआ है।
--- स्कन्द।
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कोरोनावायरस-एक्स्प्लेनर-इन-चीफ ! कोरोनावायरस-पोप ! कोरोनावायरस-ज़ार !
इन नामों से उनके देश व यूरोप की मीडिया उन्हें नवाज़ती है। शक़्ल जुरासिक पार्क वाले जेफ़ गोल्डब्लम से मिलती-जुलती। एकदम नर्ड भंगिमाओं से युक्त। उनपर मीम बनते हैं : "तुमने हमें डायनासॉर से बचाया , वायरस से भी बचाओगे" ! कोविड-19-शोध व नियन्त्रण के सन्दर्भ में वे अपनी चांसलर एंजेला मर्केल से लगातार सम्पर्क में बने हुए हैं : 'क्या ये हमारे चांसलर हैं ?" --- अख़बारों में उनके चित्र के साथ ख़बर छपती है। नेताओं को वे वायरोलॉजी पढ़ाते हैं। रोज़ उन्हें हज़ारों सन्देश मिला करते हैं , ज़्यादातर शान्त व सुखद होते हैं। कई वृद्ध महिलाएँ उनसे कहती हैं कि 'ठीक से खाना-वाना खाते रहा करो'।लेकिन कुछ लोग उन्हें धमकियाँ भी देते हैं क्योंकि वे उन्हें जर्मनी को बन्द करने का उत्तरदायी ठहराते हैं। पुलिस उनके इनबॉक्स की लगातार निगरानी करती है और देश के टैब्लॉयड जब सर्वे कराकर पूछते हैं कि 'आप सर्वाधिक किस विषाणुविज्ञानी पर भरोसा करते हैं' , तब उनका नाम अव्वल निकलता है।
वे डॉक्टर क्रिश्चियन ड्रोस्टेन हैं। जर्मन विषाणुविज्ञानी। उनके देश ने अपने ढंग से कोविड-पैंडेमिक-नियन्त्रण करके समूची यूरोप व दुनिया में उदाहरण प्रस्तुत किया है , तो इसमें उनका भी बड़ा योगदान है। शान्त ढंग से वैज्ञानिक संवाद करते वे संसार-भर के सबसे सुख्यात कोरोनाविषाणु-विशेषज्ञों में से एक हैं। दस लाख जर्मन लोग सप्ताह में दो बार दस बजे रेडियो पर उनका पॉडकास्ट सुनते हैं। चालीस मिनट तक एक विज्ञान-पत्रकार उनसे सवाल करता है , वे उत्तर देते हैं। वैक्सीन के बारे में , मास्क और स्कूलबन्दी के बारे में। दवाओं पर शोध के विषय में , श्वसन-बिन्दुओं के बारे में , जिनसे यह फैलता है। वे कुछ-सौ विज्ञान-छात्रों को इस कठिन दौर में वायरोलॉजी नहीं पढ़ा रहे , वे इस समय जनशिक्षक बनकर अपना कर्त्तव्य निभा रहे हैं।
क्रिश्चियन ड्रोस्टेन का पूरा जीवन कोरोनाविषाणुओं को समर्पित रहा है। सन् 2003 से पहले इन विषाणुओं पर कोई ख़ास ध्यान नहीं देता था। न मेडिकल छात्र , और न बेसिक साइंस वाले। तब-तब केवल दो कोरोनाविषाणु पता थे , दोनों ज़ुकाम-खाँसी करते थे। मामूली लक्षण। केवल कुछ दिन के लिए। बस ! फिर सब ठीक ! फिर सन् 2003 आया। मार्च पन्द्रह , 2003 को सिंगापुर से एक डॉक्टर लिऑन्ग हो को फ़्रैंकफ़र्ट , जर्मनी लाया गया। लिऑन्ग सिंगापुर में मरीज़ों का इलाज कर रहे थे और एक कोर्स के लिए न्यूयॉर्क जाते समय उन्हें श्वसन-सम्बन्धी लक्षणों के लिए जर्मनी रुकना पड़ा। उसी दिन विश्व-स्वास्थ्य संगठन से इस नये विषाणु को सार्स नाम दिया था।
ड्रोस्टेन उस समय नयी प्रयोगशाला बना रहे थे। मॉलीक्यूलर डायग्नोसिस के लिए। हैमबर्ग में। लिऑन्ग के ख़ून व अन्य नमूने ड्रोस्टेन के पास भेजे गये : उम्मीद थी कि वे इनमें मौजूद विषाणु को पहचान लेंगे। एक हफ़्ता लगा। अनेक विषाणुओं से नमूनों के विषाणु का मिलान किया गया। न , वह एकदम भिन्न था। फिर ड्रोस्टेन ने उसके जीनोम को मवेशियों के कोरोनाविषाणु से मिलाकर देखा। मिलान हो गया। यह एक नया कोरोनावायरस ही था। तीसरा कोरोनावायरस , किन्तु नज़ले-ज़ुकाम से कहीं अधिक यह न्यूमोनिया कर रहा था। जानें ले रहा यह नया कोरोना-परिवार-सदस्य मामूली नहीं था। दस प्रतिशत लोग जो इससे संक्रमित होते थे , जान से हाथ धो बैठते थे।
ड्रोस्टेन ने इस नये विषाणु के लिए डायग्नोस्टिक टेस्ट भी बनाया। अन्तरराष्ट्रीय ख्याति मिली , जर्मनी ने भी सम्मानों से नवाज़ा। डॉ. लिऑन्ग सार्स से ठीक होकर आज कोविड-19 रोगियों का इलाज करते समय ड्रोस्टेन को याद करते हैं। उनके अनुसार वे अद्भुत वैज्ञानिक हैं : एकदम आउट-ऑफ़-दि-बॉक्स सोच वाले !
ड्रोस्टेन यही नहीं रुके , न कोरोना-कथा रुकी। सार्स को पहचानने के बाद वैज्ञानिकों ने दो और कोरोनावायरस ढूँढ निकाले , ये भी मामूली ही थे। अब इस परिवार में पाँच सदस्य हो चुके थे। फिर सन् 2012 में एक न्यूमोनियाग्रस्त सऊदी वृद्ध से नया छठाँ कोरोनावायरस ढूँढ निकाला गया और इससे होने वाले रोग को 'मर्स' नाम दिया गया। ऊँट इस नये विषाणु को मनुष्यों में पहुँचाने के लिए उत्तरदायी समझे गये। ऐसे में सऊदी अरब का भड़कना लाज़िमी था। ऊँटों की दौड़ उनके यहाँ मिलियन-डॉलर उद्योग है ! ऊँटों की बुराई कैसे सुन ली जाए ! पर ड्रोस्टेन ने सिद्ध किया कि स्पष्ट रूप से यह ऊँटों से मनुष्यों में स्पीशीज़-जम्प करने वाला विषाणु था , उसी तरह जिस तरह से सार्स चमगादड़ों से मनुष्यों में पहुँचा था।
इस साल जब नवीन कोरोनाविषाणु का नाम उभरा , तब ड्रोस्टेन फिर तैयार थे। उन्होंने ज्यों ही इस नवीन कोरोनाविषाणु का जीनोम पाया ,उसके लिए डायग्नोस्टिक जाँच तैयार कर दी। आज जब संसार-भर में कोविड-19 पैंडेमिक फैली हुई है , तब ड्रोस्टेन आश्चर्य में हैं। "मुझे नहीं लगता कि सार्स इस तरह से लौट सकता है।" वे कहते हैं। "यह नवीन विषाणु प्रसारत्व और मारकत्व दोनों लिये हुए है। लक्षणों के पैदा होने से पहले ही यह दूसरे व्यक्ति में पहुँच जाता है !"
आज दुनिया-भर के वैज्ञानिक-समुदाय के लिए ड्रोस्टेन का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं। जर्मनी में तो वे विज्ञान-नायक हो ही चुके हैं। वे डपट देते हैं जब राजनीतिक पत्रकार उनसे महत्त्वपूर्ण सॉकर-मैचों के बार में पूछते हैं और यह जानना चाहते हैं कि क्या जर्मनी में ऑक्टोबरफ़ेस्ट निरस्त कर दिया जाएगा। "यह मेरा कार्यक्षेत्र नहीं है !" वे चिढ़ जाते हैं , जब लोग उनके कमनीय होठों या घुँघराले बालों पर बात करते हैं। "मुझसे विज्ञान पर बात कीजिए ! मैं अपने हेयरकट के लिए नहीं मशहूर होना चाहता !" अन्य लोग मानते हैं कि ड्रोस्टेन विज्ञान-प्रसारक और वैज्ञानिक बेहतरीन हैं , लेकिन मीडिया की अभिरुचियों के बारे में काफी मासूम हैं। ख्याति के साथ कटाक्ष भी प्रसिद्ध व्यक्ति कमाता है , वे इस बात से अभी साम्य नहीं बिठा पा रहे।
ड्रोस्टेन जैसे वैज्ञानिकों की जर्मनी में ख्याति उस देश की विज्ञानवृत्ति के बारे में भी बताती है। देश अपने नायक केवल उन्हें नहीं चुनता जो उसे संकट से उबारते हैं , बल्कि वह उनके लिए सम्मान से झुकता है , जिन संकटमोचकों को वह अपने तमाम नागरिकों में सामान्य पाता है। संकट से उबारने वाला सामान्य ही बड़ा जननायक हो सकता है : क्रिश्चियन ड्रोस्टेन में इन दोनों गुणों की पर्याप्त उपस्थिति है।
( प्रख्यात विज्ञान-जर्नल 'साइंस' से आहरित और उसी पर आधारित लेख। )
--- स्कन्द।
#skandshukla22
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आरोग्य सेतु पर नया खुलासा...📣📣📣
आरोग्य सेतु की प्रायवेसी को लेकर राहुल गाँधी ने जो सवाल उठाए है वो मैं 14 अप्रेल को ही अपनी पोस्ट में पूछ चुका था राहुल गाँधी के सवाल पर रविशंकर प्रसाद जी ने बोला है कि इस आरोग्य सेतु एप्प को किसी निजी ऑपरेटर को आउटसोर्स नही किया है पर रविशंकर जी से यह सवाल पूछना चाहिए कि वो 30 वालंटियर कौन थे जिन्होंने इस एप्प को बनाया था
इन 30 वालंटियर में गूगल में काम कर चुके ललितेश है और मेक माय ट्रिप वाले दीप कालरा है जो 23 अप्रैल को बाकायदा इंटरव्यू देकर इस एप्प का निर्माण करने का दावा कर रहे है और जो खूबियां और बारीकियां वो बता रहे है वो वही बता सकता है जो एप्प की डेवलपमेंट टीम का हिस्सा रहा हो तो ऐसे मैं सच कौन बोल रहा है इसका जवाब कौन देगा??
इस एप्पलीकेशन की सुरक्षा पर कितना कम ध्यान दिया गया है की आप इस एप को प्ले स्टोर के अलावा apk को डायरेक्ट भी इंस्टाल कर सकते है और रिवेर्स इंजीनियरिंग करके उसकी टर्म्स और कंडीशन को भी बिना माने बिना परमिशन कोई परमिशन के हासिल कर सकते है जिससे सरकार को डाटा भी नही पहुँचेगा अब सरकार सभी निजी और सरकारी कर्मचारियों के लिए इसे अनिवार्य कर रही है तो इस बात की क्या ग्यारन्टी है कि वो सारा डाटा सही हाथो में जायेगा...!!!
भारत की सेना ने भी इसकी सुरक्षा को लेकर सवाल उठाए है कोई भी इससे मिलती जुलती नाम वाली ऐप बना कर डाटा क्लोनिंग कर सकता है और देश की सुरक्षा में सेंध लगा सकता है सरकार के पास इतने बड़े डाटा को सुरक्षित रखने के लिए डाटा सेंटर भी नही है तो ऐसे में सरकार किसी निजी कंपनी के क्लाउड सर्वर का उपयोग जरुर कर रही होगी ऐसे में रविशंकर प्रसाद जी से यह 5 सवाल अवश्य पूछे जाना चाहिए
1. इस ऐप के माध्यम से कौन सा खास डेटा एकत्र किया जाएगा ?? और किसके पास इसका एक्सेस रहेगा ??
2.यह डाटा कब तक और किस सर्वर पर सेव किया जाएगा और उन सर्वरों का मालिक कौन है सरकार या कोई ??
3.एप्प से डेटा का उपयोग करने में सरकार की क्या योजना है?
4.उन 30 वालंटियर के क्या नाम है और उनके इस एप्प के निर्माण करने के दावे मैं कितना दम है ???
5.सरकार ने ऐप की सुरक्षा के लिए किन अंतरराष्ट्रीय मानकों का उपयोग किया गया है ???
मैंने सरकार को एक सुरक्षित ऐप का आइडिया 2 महीने पहले दिया था लेकिन सरकार ने पता नही किस से ऐप बनवा ली जबकि भारत आईटी सुपर पावर है और देश के कितने ही इंजीनियर औऱ कम्पनीया इससे बेहतर और सुरक्षित ऐप बना सकने में सक्षम है पर यह सरकार न तो सुझाव मानती है और न सवालो का जवाब देती है पर कोई क्या करे "चोरी ऊपर सिनाजोरि" की आदत जो पड़ी है ईश्वर सद्बुद्धि दे 🙏🙏
#डाटावाणी
अपूर्व भारद्वाज
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वह डॉक्टर के सामने बैठा हुआ बात कर रहा था। एकदम सामान्य। बीच-बीच में फ़ोन को खँगालता। लग ही न रहा था कि उसके शरीर में कोई असामान्य घटना चल रही हो। बस उँगली में लगा पल्स-ऑक्सीमीटर जो ख़ून में मौजूद ऑक्सीजन का आंशिक दबाव नापता है --- उसकी रीडिंग सामान्य से कम आ रही थी। 80 % मात्र।
--- वह कोविड-19-संक्रमित था और उसके फेफड़े प्रभावित थे , पर देखने से स्थिति उतनी गम्भीर नहीं लगती थी।
ख़ून में दो गैसों की मौजूदगी से ढेरों लोग परिचित हैं : ऑक्सीजन व कार्बनडायऑक्साइड। ऑक्सीजन फेफड़ों से शरीर-भर में पहुँचायी जाती है , कार्बनडायऑक्साइड शरीर-भर से फेफड़ों में लौटती है। इन दोनों गैसों की मात्रा आमतौर पर ख़ून में नहीं नापी जाती , इन्हें आंशिक दबाव यानी पार्शियल प्रेशर में व्यक्त किया जाता है। साथ ही ऑक्सीजन की सन्तृप्ति यानी सैचुरेशन को एक और ढंग से व्यक्त करते हैं : प्रतिशत में। स्वस्थ्य व्यक्ति का ऑक्सीजन-सैचुरेशन 98-99 % हुआ करता है। इस प्रतिशत का 90 के नीचे जाने का अर्थ ख़ून में ऑक्सीजन की कमी। इस कमी को मेडिकल भाषा में हायपॉक्सिया नाम दिया गया है।
कोविड-19 रोगियों के शरीर डॉक्टरों के लिए एक आश्चर्य प्रस्तुत कर रहे हैं। वे रोगी नहीं , जो गम्भीर रूप से बीमार हैं। उनके ख़ून में तो ऑक्सीजन-सैचुरेशन और पार्शियल प्रेशर कम हैं ही , उन्हें तो हायपॉक्सिया है ही। लेकिन जिनमें मामूली लक्षण हैं और जो शक़्ल से मामूली रूप से बीमार लग रहे हैं , उनका भी ऑक्सीजन-सैचुरेशन सामान्य नहीं आ रहा बल्कि वह कम है। यानी रोगी के चेहरे को देख कर धोखा हो रहा है और ख़ून में गिर रहे ऑक्सीजन-स्तर का पता ही नहीं चल रहा , जब तक पल्स-ऑक्सीमीटर मशीन की तरफ़ डॉक्टर न देखे ! डॉक्टरों ने इसे 'हैपी हायपॉक्सिया' नाम दिया है : प्रसन्न ( यानी सामान्य ) चेहरे के साथ ख़ून में ऑक्सीजन-स्तर का गिरते जाना।
दुनिया-भर के अनेक डॉक्टरों ने इस फाइंडिंग की पुष्टि की है। फेफड़ों की तमाम बीमारियों में हायपॉक्सिया होता है , यानी रक्त में ऑक्सीजन-स्तर गिरता है। किन्तु कोविड-19 के ढेरों रोगियों में ऐसे रोगी लक्षणहीन या मामूली लक्षणों से युक्त रहा करते हैं। श्वसन सामान्य है , चेहरे पर कोई तनाव नहीं किन्तु पल्स-ऑक्सीमीटर में ऑक्सीजन-सैचुरेशन गिर रहा है। 70 % - 60 % - 50 % ... धीरे-धीरे-धीरे।
पर ऐसा क्यों है , इस पर अनेक डॉक्टर अपने मत रख रहे हैं। एक महत्त्वपूर्ण मत यह है कि इन रोगियों के फेफड़ों की नन्ही रक्तवाहिनियों में ख़ून जम रहा है। ये नन्ही ख़ून की नलियाँ ब्लॉक हो रही हैं। इन्फ्लेमेशन के कारण यह रक्त का जमाव आरम्भ हुआ है : केवल फेफड़ों में ही नहीं, पैरों की उँगलियों में भी अनेक डॉक्टरों ने ऐसे ख़ून-जमाव की पुष्टि की है। कई डॉक्टर ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति में ख़ून पतला करने वाली दवाएँ जैसे हिपैरिन देते हैं , जिससे न केवल फेफड़ों की स्थिति सुधर रही है बल्कि पैरों की उँगलियाँ भी सामान्य हो गयी हैं। ऐसे में कोविड-19 रोगियों के फेफड़ों की नन्ही रक्तवाहिनियों को थक्कों से पाट देने वाली यह प्रक्रिया शोध का विषय बन गयी है।
क्या डॉक्टर सामान्य चेहरे वाले इन रोगियों में हिपैरिन जैसी ख़ून पतला करने वाली दवाएँ दें ? या अभी और शोध के नतीजों का इंतज़ार करें ? इस परिस्थिति में रोगियों को ऑक्सीजन का श्वसन-सपोर्ट देते हुए वे उन्हें पेट के बल लेटने को कहें ताकि फेफड़ों के निचले हिस्सों में हवा जाने लगे ? और क्या वे एहतियातन वेंटिलेटर का इस्तेमाल करके लक्षणों को विकसित होने से पहले ही रोक लें ? क्या घरों में पल्स-ऑक्सीमीटर रखकर लक्षणहीन अथवा मामूली लक्षणों वाले कोविड-19 रोगी अपना ऑक्सीजन-सैचुरेशन जाँचते रहें ? किसी मशीन से जाँचने पर कम आया ऑक्सीजन-स्तर क्या हमेशा फेफड़ों के सम्बन्ध में आगामी बुरी स्थिति का ही द्योतक माना जाना चाहिए ?
इन-सब प्रश्नों के उत्तरों को लेकर संसार-भर के डॉक्टर एक-मत नहीं हैं। यह बीमारी नयी है , उसके शारीरिक बदलाव भी। इसलिए ये सभी प्रश्न शोध के लिए खुले हैं और इन पर काम लगातार जारी है।
--- स्कन्द।
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कोविड-19 के कारण पिछले 24 घंटे में 83 लोगों की मौत हुई है। इससे पहले 24 घंटे में इतनी मौतें नहीं हुईं। संक्रमण से मरने वाले मरीज़ों की संख्या 1300 से अधिक हो चुकी है।
क्या यह हर्ष और उल्लास का समय है कि हम आसमान से पुष्पवर्षा करें और वो भी #सेना को आगे करके ताकि #सेना_के_नाम पर #सारे_सवाल #देशद्रोही बताए जाने लगें?
तालाबंदी के दौरान हमें ऐसा क्या हासिल कर लिया जिसके लिए हम पुष्प वर्षा कर रहे हैं? संक्रमित मरीज़ों की संख्या धीमी गति से बढ़ रही है लेकिन बढ़ तो रही है। लेकिन क्या वाकई गति इतनी धीमी है कि हम पुष्प वर्षा करने लग जाएं?
3 मई की सुबह स्वास्थ्य मंत्रालय की बुलेटिन के अनुसार संक्रमित मरीज़ों की संख्या 39,980 हो चुकी थी। 24 घंटे में 2644 मामले सामने आए हैं। ज़ाहिर है शाम तो यह संख्या 40,000 के पार भी कर जाएगी। अगर दस दिनों में डबल होने का औसत ही देखें तो 13 मई तक हम 80,000 के आस-पास होंगे। क्या इसे कामयाबी कहेंगे?
हर बार डाक्टर और हेल्थ स्टाफ के नाम पर यह सब किया जा रहा है। लेकिन अभी तक हेल्थ स्टाफ को सारी सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई गईं हैं। अलग से नहीं बताया जाता है कि देश भर में कितने हेल्थ स्टाफ संक्रमित हैं? जिस अस्पताल के ऊपर फूलों की वर्षा हो रही है उसके भीतर बैठा डॉक्टर या नर्स क्या बिल्कुल इस सच्चाई को नहीं देख पाएंगे?

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आजादी के बाद नेहरू जी ने बोला : "सब कोई इंतजार कर सकता है, पर किसान इंतजार नही कर सकता"..
और यही किसानों की प्रगति का मूलमंत्र बना..
● भाखड़ा डैम से "ग्रीन रेवोल्यूशन" शुरू हुआ..2008 में M S Swaminathan साहब ने लिखा कि नेहरू जी ने भारत मे आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से आधुनिक कृषि की नींव रखी..
★ नेहरू जी की प्लानिंग और संरचना..
"ग्रो मोर फ़ूड" 1956-61 तक का नेहरू जी का नारा..
- खाद और कीटनाशक फैक्ट्री बनवाई
- बड़े डैम और पॉवर प्रोजेक्ट बनवाये
- हीराकुद डैम, नागार्जुन डैम, सरदार सरोवर
- कम्युनिटी डेवलपमेंट और राष्ट्रीय विस्तार
- एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी श्रृंखला का निर्माण
- इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट 1958
- एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट श्रृंखला बनवाई
★★ 1952 मे नेहरू जी ने संसद में कहा कि भारत का औद्योगिकरण किसानों के बिना सम्भव नही..
अगर किसान खुश नही तो इंडस्ट्री नही चलेगी और सबकुछ बिखर जायेगा..
2014 के बाद किसान और किसानी खत्म कर दिए गए..किसान आज नेहरू जी को तलाश रहा है..
देश को बचाना है
तो नेहरू ही प्रथम और अंतिम विकल्प है..अय्यर
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भारत कोरोना को हरा चुका है..TV पर देख लीजिए..श्वेता "डींग" सॉरी सिंह साहिबा कह रही है..
- भारत 3 महीने में वैक्सीन बना लेगा
- अबकी बार कोरोना पर जबरदस्त प्रहार
● श्वेता सिंह, बोलो मोदी को की गुजरात को कोरोना मुक्त कर दे..मध्यप्रदेश में आटा चोरों को गिरफ्तार करे..कालाबाजारी रोक दे..
● रजत शर्मा के चैनल की बात ही निराली है..मोदी को सुपरमैन दिखाया है..सैनिटाइजर की मिसाइल ले कर अमेरिका से भारत तक वायरस का पीछा कर रहा है मोदी..और दूसरे हाथ मे संजीवनी है..पूरा विश्व मोदी के सामने नतमस्तक है..
★ विपक्षी राज्यो के राज्यपाल लगातार बयानबाजी कर रहे है..विपक्षी राज्यो में केंद्रीय टीम भेजी जा रही है गलतियां निकालने..हिन्दू मुस्लिम तो मूलमंत्र है..
◆ करोड़ो लोगों की भुख, बीमारी, त्रासदी सब हट चुकी है..हर बात पर हिंसा, सम्प्रदायिकता और फेक न्यूज़ तैयार है..
540 टुकड़े जोड़ कर बनाया गया देश है..हर टुकड़ा महत्वपूर्ण है..विश्वास और एकता का जोड़ अगर टूटा तो किसीका भला नही होगा.. #राहुलगांधी #प्रियंकागांधी #aicc #krishnaniyer
20 April at 14:47 · Facebook for Android · Public
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भोपाल। नवदुनिया प्रतिनिधि। Coronavirus Bhopal News भोपाल के लिए सुकून देने वाली खबर है। पिछले तीन से जांचे गए सैेंपलों में सिर्फ एक से डेढ़ फीसदी मरीज ही मिले हैं। हफ्ते भर पहले (25 अप्रैल को)यह दर 4.27 फीसदी थी। तीन दिन में 2290 सैंपलों की जांच में सिर्फ 28 मरीज संक्रमित पाए गए हैं। इसके पहले भोपाल में हर दिन 22 से 40 मरीज मिल रहे थे। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दिनों में मरीजों की संख्या और कम हो सकती है। हां, लोगों को शारीरिक दूरी का पालन करना होगा।

भोपाल में अभी तक जांचे गए सैंपलों में संक्रमित मिले लोगों का प्रतिशत (औसत संक्रमण दर) 5.4 है। 25 अप्रैल से इसमें कुछ गिरावट शुरू हुई। 25 से 29 अप्रैल के बीच उन सैंपलों की रिपोर्ट भी आई जो जांच के लिए पुडुचेरी, एनआईबी दिल्ली व अन्य जगह भेजे गए थे। इस कारण संक्रमितों की संख्या ज्यादा आ रही थी। इसके बाद 30 अप्रैल को 1000 सैंपलों की जांच में 15 मरीज संक्रमित मिले थे। 1 मई को 750 मरीजों की जांच भोपाल की अलग-अलग लैब में हुई थी, इसमें 8 मरीज मिले थे। दो मई को 540 सैंपलों की जांच में सिर्फ छह लोग संक्रमित पाए गए हैं।

सैंपल लेना कम नहीं करेंगे

सीएमएचओ डॉ. प्रभाकर तिवारी ने उम्मीद जताई है कि संक्रमण दर अब इससे ज्यादा नहीं जाएगी। उन्होंने कहा कि लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है, पर सावधानी रखने बहुत जरूरत है। घर से बाहर जाएं तो दूसरों से कम से कम दो गज दूर रहें। उन्होंने कहा कि मरीजों की संख्या कम होने पर भी सैंपल कम नहीं करेंगे। हर दिन करीब 700 सैंपल लिए जा रहे हैं।

इनका कहना है

कोरोना का संक्रमण धीरे-धीरे कम होने की उम्मीद है। लॉकडाउन खुलने के बाद भी लोगों को इसी तरह से सतर्कता और शारीरिक दूरी रखना होगी नहीं तो तेजी से केस बढ़ेंगे।

डॉ. लोकेन्द्र दवे एचओडी, पल्मोनरी मेडिसिन विभाग, जीएमसी
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लखनऊ, जेएनएन। Coronavirus Safety वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के संक्रमण पर अंकुश लगाने की खातिर अपनी टीम-11 के साथ मैदान में डटे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भरोसा है कि भारत इस महामारी से जंग जीतेगा। सीएम योगी आदित्यनाथ ने एक निजी न्यूज चैनल के साथ अपनी वरीयता के साथ कोरोना वायरस से बचाव पर अपनी सरकार की योजना पर विस्तार से चर्चा की।

सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि कोरोना के खिलाफ लड़ाई में हम कई देशों के मुकाबले बेहतर स्थिति में हैं, लेकिन हमें अभी भी और सतर्क रहने की जरूरत होगी। उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस से बचने के लिए हम व्यापक कार्ययोजना बना रहे हैं। पीएम नरेंद्र मोदी के निर्देश पर देश में लंबे लॉकडाउन से सभी को बड़ी राहत मिली है। हमने भी अफसरों की टीम के साथ मंत्रियों का समूह गठित किया है। कोरोना से निपटने के लिए हम लोग रोज एक-एक आगे बढ़ रहे हैं। हम क्रमबद्ध तरीके से कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए काम कर रहे हैं।

सच छुपाने वाले जमातियों पर होगा कड़ा एक्शन

सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि कोरोना वायरस नेचर के साथ अपना स्वरूप भी बदलता है। ऐसे में हमें पूरी तरह से सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने के साथ लोंगो को जागरुक करने से ही सफलता मिलेगी। यूपी में जिस तरह से आबादी है, ऐसे में कोरोना से निपटने का काम हमारे लिए चुनौतीपूर्ण है, लेकिन हम पूरी तरह से प्रदेश को कोरोना से मुक्त करेंगे। प्रदेश में तो स्थिति काफी नियंत्रण में आ गई थी, इसी बीच दिल्ली से पहुंचे तब्लीगी जमात के लोगों ने यहां का माहौल खराब कर दिया। बिना किसी सूचना के यह लोग घनी आबादी में घुस गए और फिर संक्रमण ने गति पकड़ ली। सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि यह तो तय है कि सच छुपाने वाले किसी भी जमाती को छोड़ा नहीं जाएगा। सभी के खिलाफ एक्शन तय है। सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि जमातियों ने कोरोना वायरस संक्रमण को झुपाया है। यह जानबूझकर किया गया कृत्य हैं, जोकि अक्षम्य अपराध हैं। अगर इन्होंने यह काम न किया होता तो आज कम से कम कोरोना केस होते।

सीएम योगी ने यह भी कहा कि हम इन लोगों के खिलाफ कार्रवाई जरूर करेंगे। सीएम योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश में कोरोना फैलाने के लिए तब्लीगी जमात के लोगों को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने कहा कि जमातियों ने बीमारी को छुपाया। संक्रमण से फैलने वाली बीमारी को छुपाकर आप उसको जगह-जगह फैलाएं, हमको तो यह स्वीकार्य नहीं है। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि तब्लीगी के इस रवैये के कारण संक्रमण बहुत तेजी से फैला। यूपी में 3000 से ज्यादा जमातियों ने कई जगह जाकर ऐसा किया। आज हमारे पास लगभग दो ऐक्टिव केस हैं, इसमें डेढ़ हजार से ज्यादा तबलीगी से जुड़े लोग हैं। हमारी पुलिस ने उन्हेंं पकड़कर क्वारंटीन किया। फिर अस्पताल में गए ,वहां फैलाया और आज यह स्थिति है। अगर समय रहते इन्होंने अपील पर ध्यान दिया होता तो यह हालत नहीं होती। सबसे पहले तो पॉजिटिव महसूस कर रहे व्यक्ति को खुद ही सामने आना चाहिए। देश के अंदर जिन राज्यों में ज्यादा पैमाने पर मामले आए वहां इनकी भूमिका बहुत थी। विदेश से आए, टूरिस्ट वीजा लिया और घूमने लगे। सामान्य व्यक्ति मानता है कि टूरिस्ट है तो ठीक होगा लेकिन गांव-गांव, घर-घर जाकर संक्रमण फैलाएं तो यह ठीक बात नहीं थी।



पूजा-नमाज के साथ जान बचाव भी जरूरी

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि हम लोग पूजा-नमाज घर से कर सकते हैं, लेकिन आज तो जान बचाना ही हमारी वरीयता है। कोरोना जैसी महामारी से खुद को और लोगों को बचाना महत्वपूर्ण है। ऐसी हालत में लोगों को मंदिर में पूजा या फिर मस्जिद में नमाज की जगह सभी काम घर से करना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमने प्रदेश में धाॢमक सार्वजानिक कार्यक्रम पर पूरी रोक लगा रखी है। घर पर ही अराधना या नमाज कर कोरोना से खुद की और दूसरों की जान बचाएं।

सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि कोरोना संक्रमण को देखते हुए हमने रमजान से पहले सभी धर्मगुरुओं से बात कर किया था। इन सारे लोगों ने कहा था कि कोरोना की इस महामारी से बचना भी है और लोगों को बचाना भी है। हम आम तौर पर पूजा के लिए मंदिर और नमाज के लिए मस्जिद जाते हैं, लेकिन पूजा-नमाज घर से भी की जा सकती है। आज सबसे जान बचाना सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि नवरात्रि में मंदिर के बजाय लोगों ने घर से पूजा-पाठ और तमाम धाॢमक अनुष्ठान के काम किए थे। ऐसे में ही हमने रमजान को लेकर भी कहा कि आप लोग अपने-अपने घरों से रोज-नमाज करें। इस दौरान कोई सार्वजनिक कार्य नहीं किए जाने चाहिए, क्योंकि हमें सोशल डिस्टेंसिंग का पूरी तरह से पालन करना है।

पीएम गरीब कल्याण पैकेज बड़ा हथियार

सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पूरा देश कोरोना के खिलाफ जिस लड़ाई को लड़ रहा है। पीएम गरीब कल्याण पैकेज की घोषणा गरीबों के लिए हो चुकी है। यह कोरोना वायरस में लोगों को मजबूती देने वाला बड़ा हथियार है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गरीब कल्याण पैकेज दिया है, इसके साथ ही कोरोना वॉरियर के लिए 50 लाख का बीमा भी लागू किया है। इसमें सभी तबकों का ध्यान रखने के साथ ही इस लड़ाई को आगे बढ़ाने का काम हो रहा है। इससे निर्माण कार्य में लगे कामगारों के साथ प्रतिदिन कमाने वालों के लिए भरण पोषण के लिए भत्ते की व्यवस्था की गई है। हमने मनरेगा के मजदूरों के लिए अलग से व्यवस्था की है।



मजदूरों की वापसी कराएंगे नोडल अधिकारी

उत्तर प्रदेश के प्रवासी मजूदरों की वापसी को लेकर योगी आदित्यनाथ ने कहा कि मजदूरों को वापस लाने के लिए हमने अलग-अलग राज्यों के लिए नोडल अधिकारी नियुक्त कर दिए हैं। दूसरे राज्यों से आने वाले सभी लोगों का मेडिकल चेकअप होगा और उनको क्वारंटाइन में भेजने का काम किया जाएगा। मेरी मजदूरों से अपील है कि पैदन ना चलें, जहां हैं वहीं रहें। मैं तो उन सभी को आश्वासन देता हूं कि उन्हेंं कोई तकलीफ नहीं होगी। उन्होंने कहा कि पांच-दस किमी पैदल चला जा सकता है, लेकिन हजार किमी नहीं चला जा सकता है। इससे उन्हेंं भी तकलीफ होगी और कोरोना संक्रमण के भी खतरे भी बढ़ेंगे। हमने केंद्र की सभी गाइडलाइन का पालन करते हुए मजदूरों को वापस लाने का काम शुरू कर दिया है। उत्तर प्रदेश में दस लाख लोगों के शेल्टर रूम में रहने और क्वारंटाइन करने की व्यवस्था सरकार ने की है। जो दूसरे राज्यों से आएंगे उन्हेंं रखा जाएगा। जो भी मजदूर और श्रमिक दूसरे राज्यों से आएंगे उसकी सभी जानकारी ली जाएगी। सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि केंद्र से ट्रेन की मांग की है। इस आधार पर आज पहली ट्रेन नासिक से यूपी आ रही है और रविवार को गुजरात सहित अन्य क्षेत्रों से चार ट्रेनें और भी चलने लगेंगी।



राजस्व पर बड़ा असर

लॉकडाउन से राजस्व पर पडऩे वाले असर पर सीएम योगी आदित्यनाथ ने बताया कि ऐसे में उत्तर प्रदेश में एक महीने में 17 से 18 हजार करोड़ रुपये राजस्व प्राप्त होता था, लेकिन इस बार एक हजार करोड़ ही राजस्व आया है। सीएम ने कहा कि उत्तर प्रदेश में पहली मई को 16 लाख कर्मचारियों के वेतन को बिना किसी कटौती के दिया गया है। हम किसी का वेतन नहीं काटेंगे। राज्य सरकार ने अनावश्यक खर्चों में कटौती की है, लेकिन हमारे सभी प्रोजेक्ट चल रहे हैं।

फिलहाल हमारे लिए राजस्व से ज्यादा चिंता अपने नागरिकों की रक्षा करना महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि हम केंद्र की गाइडलाइन का पालन करते हुए रेड जोन में किसी तरह की कोई छूट नहीं देगे और ऑरेंज और ग्रीन जोन में कुछ छूट देंगे। ग्रामीण इलाकों में हम लोगों ने सब्जी और किराने की दुकानों को पहले से छूट दे चुके हैं। ऐसे में हमारी कोशिश है कि ऑरेंज जोन को ग्रीन में और रेड जोन को पहले ऑरेंज और फिर ग्रीन बदलकर कोरोना से प्रदेश को मुक्त करें।
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लखनऊ, जेएनएन। चीन से निकलने के बाद महामारी का रूप धारण करने वाले कोरोना वायरस संक्रमण पर अंकुश लगाने के लिए देश में चार मई से लाकडाउन 3.0 लागू किया गया है। यह 17 मई तक रहेगा, इसी दौरान सरकार ने कोरोना पॉजिटिव केस देखते हुए शहरों को तीन जोन में बांटा है। रेड जोन सबसे खतरनाक है। यहां पर बेहद आवश्यक सेवा के अलावा लॉकडाउन का सख्ती से पालन होगा। ऑरेंज तथा ग्रीन जोन वालों को राहत दी गई है।

लॉकडाउन 3.0 में प्रदेश में रेड जोन वाले क्षेत्रों को छोड़कर अन्य जगह पर शराब की दुकानें नौ घंटा तक खुलेंगी। सरकार को अब लोगों की जान के साथ अपने जहान यानी राजस्व की भी चिंता है। इसी को देखते हुए अन्य छूट के साथ ऑरेंज व ग्रीन जोन में आने वाले जिलों में शराब की दुकानें सुबह दस बजे से शाम सात बजे तक खोलने का निर्णय लिया गया है। इस दौरान भी फिजिकल डिस्टेंसिंग का पालन जरूरी होगा। सरकार ने सोमवार से लॉकडाउन में भी हॉटस्पॉट के कंटेंमेंट जोन को छोड़कर पूरे राज्य में शराब बिक्री शुरू करने की सशर्त अनुमति दी है हालांकि होटल और रेस्टोरेंट के बार में शराब बेचने की अनुमति नहीं है। सरकार ने शराब बिक्री के लिए कुछ शर्तें भी रखी हैं। शराब की बिक्री सिर्फ सुबह 10 से शाम 7 बजे तक ही होगी। इस दौरान भी लोगों सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना होगा। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने लॉकडाउन को और दो हफ्तों के लिए बढ़ा दिया है, जो 4 मई से प्रभावी होगा। इस दौरान शराब और पान मसालों की बिक्री को शर्तों के साथ अनुमति दी गई है। हालांकि केंद्र की ओर से छूट के बाद भी उत्‍तर प्रदेश में शराब की दुकानें खोलने को लेकर कोई निर्णय नहीं हो पाया था। मगर आज मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शराब की बिक्री को सशर्त अनुमति दे दी है।

लॉकडाउन 3.0 को लेकर उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने रविवार को गाइडलाइन जारी कर दी है। इसके तहत उत्तर प्रदेश में रेड जोन के हॉटस्पॉट को छोड़कर सभी जगह शराब की दुकानें खुलेंगी। सरकार ने रेड, ऑरेंज और ग्रीन जोन वाले जिलों में आबकारी की दुकानें खोलने के आदेश जारी कर दिए हैं। ग्रीन व ऑरेंज जोन के साथ-साथ रेड में भी सुबह 10 बजे से शाम 7 बजे तक शराब की दुकानें खुलेंगी। रेड व ऑरेंज जोन में हॉटस्पॉट के साथ कन्टेनमेंट इलाकों में दुकानें बंद रहेंगी। इस दौरान सोशल डिस्टेंसिंग की शर्तों का पालन करना होगा। रेड जोन के हॉटस्पॉट में कोई दुकान नहीं खोली जा सकेगी। आबकारी विभाग के प्रमुख सचिव संजय भूसरेड्डी ने बताया कि जिन जिलों में भी जो हॉटस्पॉट या कंटेनमेंट एरिया होगा उसके भीतर की दुकान नहीं खुलेगी बल्कि उसके बाहर की दुकानें खोली जा सकेगी। प्रमुख सचिव ने बताया कि दुकानों के बाहर दो गज की दूरी पर गोले बनाए जाएंगे जिससे सोशल डिस्टेंस मेंटेन रहे। एक बार में एक दुकान पर सिर्फ पांच लोगों की लाइन लगा करेगी।

घाटे को पटरी पर लाने की कवायद
टीम-11 के साथ आज हुई बैठक में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राजस्व घाटे को पटरी पर लाने के निर्देश दिए थे। इस दौरान शराब की दुकानों को खोलने के लिए अधिकारियों को जरुरी दिशा निर्देश जारी करने को कहा गया था। जिसके बाद मुख्य सचिव आरके तिवारी की तरफ से नई गाइडलाइन जारी की गई है। लॉकडाउन 3.0 में रेड जोन के हॉटस्पॉट में भी सख्ती बढ़ाने के निदेश भी हैं।

मुख्य सचिव राजेंद्र कुमार तिवारी ने निर्देश दिया कि लॉकडाउन 3.0 के गाइडलाइन चार मई सुबह से लागू हो जाएगी। प्रदेश को रेड, ग्रीन और आरेंज जोन में बांटा गया है।उल्लंघन करने वालों से सख्ती से निपटा जाएा।

लॉकडाउन 3.0 में इस तरह से नियम लागू होंगे

रेड जोन : रेड जोन के कंटेन्मेंट एरिया में सिर्फ आवश्यक वस्तुओं की पूर्ति और चिकित्सा व्यवस्था से जुड़े लोगों को आने जाने की अनुमति होगी।

-गैर आवश्यक गतिविधियों का आवागमन शाम 7 से सुबह 7 बजे तक बन्द रहेगा।

-कंटेन्मेंट जोन में क्लिनिक भी नहीं खुलेंगे।

- रेड, ऑरेंज और ग्रीन जोन में क्लिनिक खोले जा सकेंगे।

-रेड जोन में साइकिल रिक्शा, ऑटो रिक्शा, टैक्सी, कैब, जनपदीय, अंतर्जनपदीय बस परिवहन की मनाही होगी। बाकी जोन में चल सकेंगी।

- रेड जोन में अनुमति प्राप्त वाहन चल सकेंगे। चार पहिया वाहन में ड्राइवर के अलावा दो और दो पहिया वाहन पर एक व्यक्ति को चलने की छूट होगी।

- शहरी क्षेत्रों में औद्योगिक प्रतिष्ठान, उत्पादन इकाइयों को शर्तों के साथ चलने की अनुमति होगी।

-रेड और ऑरेंज जोन में 50 से अधिक श्रमिकों वाले प्रतिष्ठान के लिए विशेष परिवहन की सुविधा प्रतिस्थान को देनी होगी। इन वाहनों में क्षमता से आधे यात्री ही सवार हो सकेंगे।

- श्रमिकों का चिकित्सा बीमा करना अनिवार्य होगा।

- दस से अधिक लोगों की मौजूदगी के बैठक की अनुमति नहीं होगी। अगर ज़्यादा लोगों की बैठक है तो एक दूसरे के बीच 6 फुट की दूरी बनाई जानी जरूरी है।

- लिफ्ट में अधिक से अधिक 4 लोगों को चढऩे की छूट होगी।

-कोविड 19 के अधिकृत चिकित्सालयों की सूची हर कार्यस्थल पर उपलब्ध होनी चाहिए।

-औद्योगिक इकाइयों को शुरुआत में अपने कर्मचारियों की टेस्टिंग करानी होगी। इसके बाद 15 दिन के बाद 5 फीसदी या धिक्तम 10 कर्मचारियों तक रैंडम आधार पर चयनित कर टेस्ट कराना अनिवार्य होगा।

-उत्पादन इकाइयों या औद्योगिक प्रतिष्ठानों में मालिक और श्रमिकों की अपडी सहमति से कार्य के घण्टे बढ़ाये जा सकते हैं। यह व्यवस्था अगले 3 महीने तक लागू रहेगी।

- शहरी क्षेत्र में उन साइटों पर निर्माण हो सकेगा, जहां निर्माण साईट पर ही मजदूर रहते हों और उन्हें कहीं आने जाने की ज़रूरत न पड़े।

-ग्रामीण क्षेत्र में सभी प्रकार के निर्माण की अनुमति होगी।

ऑरेंज जोन

-ऑरेंज जोन में कंटेन्मेंट जोन के बाहर शराब की दुकानें खोली जा सकेंगी।

-टैक्सी कैब में एक ड्राइवर और 2 यात्रियों के साथ जि़ले की सीमा के भीतर चल सकेंगी। इन वाहनों की अनुमति है, उनका अंतर्जनपदीय परिवहन हो सकेगा।

ग्रीन जोन

- रेल परिवहन, अंतरराज्यीय बस परिवहन, मेट्रो रेल, अंतरराज्यीय आवागमन, स्कूल, कॉलेज, कोचिंग संस्थान, सिनेमा हॉल, शॉपिंग मॉल, जिम, स्विमिंग पूल, बार, सभागार, असेम्बली हॉल, सभी राजनैतिक, सामाजिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक, धार्मिक न अन्य सामूहिक गतिविधियां, धर्मिक जुलूस, धर्म स्थल जन सामान्य बन्द रहेंगे। यह नियम सभी जोन में लागू होगा।

- बसों का संचालन 50 फ़ीसदी सीटों की क्षमता के हिसाब से हो सकेगा।

- बसों और टैक्सियों को सिर्फ जिले के भीतर ही चलने की अनुमति होगी।

सभी जोन के लियर लागू नियम

-समस्त जोन में 65 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्ति, जिन्हें एक से ज्यादा बीमारी हो, गर्भवती स्त्री और दस साल से छोटे बच्चे घरों के अंदर ही रहेंगे। सिर्फ स्वास्थ्य संबंधी जरूरत के लिए बाहर निकल सकेंगे।

- माल/वस्तुओं/खाली ट्रक के अंतरराज्यीय परिवहन की पूर्ण अनुमति होगी।

-सभी जोन में शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में सुबह 10 बजे से शाम 7 बजे तक शराब की दुकानें खोली जा सकेंगी। इसमें सोशल डिस्टेंसिंग के नियम को मनाना दुकानदार के लिए आवश्यक होगा।

- केवल आवश्यक वस्तुओं के संबंध में ई-कॉमर्स गतिविधियों की अनुमति होगी।
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भोपाल। नवदुनिया प्रतिनिधि। Coronavirus Bhopal News हल्के लक्षण वाले कोरोना पॉजिटिव मरीजों को अस्पताल में भर्ती होने की बाध्यता नहीं रहेगी। वह चाहें तो अपने घर में ही आइसोलेट रह सकते हैं। शर्त यह रहेगी कि घर में उस मरीज के लिए अलग कक्ष और शौचालय हो। साथ ही परिजन के क्वारंटाइन रहने की सुविधा भी हो। अस्पताल की तरह जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आने के 14वें दिन सैंपल लिया जाएगा।

यह रिपोर्ट नेगेटिव आने पर 24 घंटे के भीतर दोबारा नेगेटिव रिपोर्ट आने उसे संक्रमण मुक्त घोषित किया जाएगा। इसके बाद अगले 14 दिन के लिए होम क्वारंटाइन रहने की सलाह दी जाएगी। स्वास्थ्य आयुक्त फैज अहमद किदवई ने इसके लिए सभी कलेक्टरों व सीएमएचओ को पत्र लिखा है। भोपाल में अभी तक मिले कोरोना के मामलों में 65 फीसदी बिना लक्षण वाले व करीब 15 फीसदी हल्के लक्षण वाले मिले हैं। ऐसे मरीज अब घर में ही आइसोलेट रह सकेंगे।

घर में आइसोलेशन की यह भी शर्त

-पॉजिटिव केस हल्के लक्षण वाला है या नहीं यह तय करने का काम डॉक्टर का होगा जो कम से कम एमबीबीएस डिग्रीधारी हो।

-संक्रमित व्यक्ति की 24 घंटे देखभाल के लिए कम से कम एक व्यक्ति होना जरूरी है। देखभाल करने वाले को मोबाइल मेडिकल यूनिट के डॉक्टरों के संपर्क में रहना होगा।

- देखभाल करने वाले को आरोग्य सेतु एप व सार्थक एप डाउनलोड करना होगा, जिससे मरीजों को स्वास्थ्य विभाग की और विभाग को मरीज की जानकारी मिलती रहे।

- मरीज को होम आइसोलेशन के लिए घोषणा पत्र देना होगा कि वह आइसोलेशन में तय शर्तों के अनुसार रहेंगे।

-देखभाल करने वाले व संपर्क में आने वाले अन्य लोगों को हाइड्राक्सीक्लोरोक्वीन दवा दी जाएगी।

- इस दौरान मरीज को सांस लेने में तकलीफ, छाती में दबाव भारीपन, मानसिक

-भ्रम, चेहरा नीला पड़ना और अन्य कोई लक्षण दिखे तो मोबाइल मेडिकल यूनिट के डॉक्टर या हेल्पलाइन सेवा 104 पर फौरन जानकारी देना होगी।

मरीज की देखभाल करने वाले को यह करना होगा

- संक्रमित व्यक्ति के कमरे में जाने पर तीन स्तर वाला मास्क उपयोग करना होगा। मास्क के भीगने या गंदा होने पर फौरन बदलना होगा।

-संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने या उपयोग की सतह को छूने के बाद साबुन-पानी से कम से कम 40 सेकंड तक हाथ धोना होगा।

- संक्रमित व्यक्ति के संपर्क के दौरान दस्ताने का उपयोग करना होगा।

- मरीज को भोजन उसके कक्ष में ही परोसना होगा। बर्तन अच्छी तरह से साबुन-पानी से साफ करना होगा।
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लंदन, प्रेट्र। कोरोना संक्रमण से पूरी तरह उबर चुके ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने बताया है कि लंदन के डॉक्टरों ने एक समय उनकी मौत की घोषणा की तैयारी कर ली थी। 55 वर्षीय जॉनसन को 26 मार्च को कोरोना संक्रमण के लक्षण दिखाई पड़े थे। इसके बाद वह सेल्फ क्वारंटाइन में चले गए थे।

ब्रिटेन में कोरोना ने ले ली अब तक 28 हजार से ज्यादा लोगों की जान

हालत नहीं सुधरने पर उन्हें लंदन के सेंट थॉमस अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 12 अप्रैल को अस्पताल से छुट्टी मिलने से पहले वह छह से नौ अप्रैल तक आइसीयू में रहे थे। ब्रिटेन में शनिवार तक कोरोना से 28 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी थी।

कोरोना संक्रमण से उबरे ब्रिटिश पीएम ने साझा किए आइसीयू के अनुभव

अखबार 'द सन' के साथ हुई बातचीत में जॉनसन ने कहा, 'सात अप्रैल को सेंट थॉमस हॉस्पिटल के आइसीयू में पहुंचने के बाद मुझे कई लीटर ऑक्सीजन दी गई, लेकिन मेरे स्वास्थ्य में कोई खास प्रगति नहीं दिखाई दे रही थी। मैं इससे इन्कार नहीं कर सकता कि वह काफी कठिन समय था। मेरी हालत ठीक नहीं थी। डॉक्टरों के पास सभी तरह के विकल्प थे कि अगर कुछ गलत हुआ तो क्या करना चाहिए? जॉनसन का यह साक्षात्कार उनकी मंगेतर कैरी साइमंड्स द्वारा अपने बेटे की तस्वीर इंस्टाग्राम पर पोस्ट करने के बात सामने आया है। उसका नाम विल्फ्रेड लॉरी निकोलस जॉनसन रखा गया है। इसमें निकोलस प्रधानमंत्री की जान बचाने वाले डॉक्टर निकोलस प्राइस और निकोलस हार्ट के नाम पर लिया गया है।

पीएम ने कहा- मैं भाग्यशाली हूं कि इस बीमारी से ठीक हो गया, 50-50 की स्थिति बन गई थी

ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने कहा, 'यह विश्वास करना काफी मुश्किल था कि केवल कुछ दिनों में मेरी हालत इस कदर बिगड़ गई। मुझे याद है कि मैं निराश महसूस कर रहा था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं ठीक क्यों नहीं हो रहा। सबसे बुरा समय तब आया जब 50-50 की स्थिति बन गई। उन्होंने मेरे विंडपाइप के नीचे एक ट्यूब लगाई। मुझे लगा इस बीमारी की कोई दवा नहीं है, कोई इलाज नहीं है। मैं इससे कैसे ठीक होऊंगा। मैं भाग्यशाली हूं कि इस बीमारी से ठीक हो गया जबकि कई अन्य लोग अब भी पीड़ित हैं।
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पटना, जागरण टीम। बिहार में, खास कर उत्तर बिहार में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (Acute Encephalitis Syndrome) अर्थात् चमकी-बुखार (Chamaki Fever) की बीमारी गर्मियों में मासूमों की मौत का कहर बनकर आती है। सरकारी आंकड़ों की बात करें तो बीते साल मुजफ्फरपुर के श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (SKMCH) में इससे 167 बच्‍चों की मौत हुई थी। इनमें अकेले मुजफ्फरपुर के 111 बच्‍चे शामिल थे। गैर सरकारी आंकड़ों पर विश्‍वास करें तो इस बीमारी के कारण डेढ़ दशक में हजार मासूमों को जान गई है। स्थिति से निबटने के लिए सरकार ने पहले से तैयारी तो की है, लेकिन कोरोना (CoronaVirus) संक्रमण के वर्तमान दौर में यह स्‍वास्‍थ्‍य विभाग (Department of Health) के लिए अग्निपरीक्षा (Acid Test) की स्थिति है।

गर्मी की आहट के साथ शुरू हो गई बीमारी, होने लगी मौत

इस साल बिहार में चमकी बुखार का पहला शिकार मुजफ्फरपुर के सकरा के बाड़ा बुजुर्ग गांव के मुन्ना राम का साढ़े तीन साल का बेटा आदित्य कुमार था। एसकेएमसीएच के शिशु रोग विभागाध्‍यक्ष डॉ. गोपाल शंकर सहनी ने बताया कि यह मुजफ्फरपुर में इस बीमारी का पहला मामला था। एसकेएमसीएच के अधीक्षक डॉ. सुनील कुमार शाही के अनुसार वैसे तो चमकी बुखार के मामले इक्के-दुक्के हमेशा आते ही रहते हैं, लेकिन पिछले साल जून-जुलाई के बाद यह पहली मौत थी।

चमकी बुखार: कारण व लक्षण

बड़ा सवाल यह है कि चमकी बुखार और इसके कारण क्‍या हैं? शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. अरुण शाह कहते हैं कि एईएस (AES) या चमकी बुखार को बीमारी का छाता (Umbrella of Diseases) कह सकते हैं। इसके लक्षण जैसी कई बीमारियां होती हैं। इसका कारण अभी तक पता नहीं। इस बीमारी पर शोध करने वाले एसकेएमसीएच के शिशु रोग विभागाध्यक्ष डॉ. गोपाल शंकर साहनी कहते हैं कि इसके मुख्य कारण गर्मी, नमी व कुपोषण सामने आए हैं। जब गर्मी 36 से 40 डिग्री व नमी 70 से 80 फीसद के बीच हो तो इसका कहर शुरू होता है। बीमारी का लक्षण तेज बुखार व चमकी आना है, इसलए इसे चमकी बुखार कहते हैं। इसमें बच्चा देखते-देखते बेहोश हो जाता है। उत्तर बिहार में 15 अप्रैल से 30 जून तक इसका प्रकोप ज्यादा रहता है।



पिछले साल एसकेएमसीएच में 167 की मौत

मुजफ्फरपुर का एसकेएमसीएच चमकी बुखार का बैरोमीटर है। उत्तर बिहार में इस बीमारी के इलाज के इस सबसे बड़े केंद्र में मौतें भी सर्वाधिक होती हैं। यहां बीते साल राज्‍य के राज्‍य के 10 जिलों मुजफ्फरपुर, पूर्वी चम्पारण, पश्चिम चम्पारण, सीतामढ़ी, वैशाली, शिवहर, दरभंगा, समस्तीपुर, बेगुसराय, दरभंगा व सुपौल तथा पड़ोसी देश नेपाल से 610 मरीज आकर इलाज कराने पहुंचे थे। उनमें 443 स्‍वस्‍थ हो गए, लेकिन 167 की मौत हो गई। पूरे राज्‍य की बात करें तो मौत का आंकड़ा करीब दो सौ रहा था।

एसकेएमसीएस के अलावा मुजफ्फरपर के केजरीवाल अस्‍पताल में भी बड़ी संख्‍या में मरीज आते हैं। राज्‍य के अधिकांश मामले इन्‍हीं दो अस्‍पतालों में आते हैं। हालांकि, इलाज की व्‍यवस्‍था अन्‍य बड़े अस्‍पतालों में भी की जाती है। इक्‍के-दुक्‍के मरीज वहां भी जाते हैं।



2014 के पहले सालाना होती थी दो से ढ़ाई सौ मौतें

दरअसल, पहले इस बीमारी से सालाना दो से ढ़ाई सौ मासूमों की जान जाती थी, लेकिन साल 2014 के बाद इसपर नियंत्रण पाने में सफलता मिली। इसके पीछे बीमारी के हॉट-स्‍पॉट इलाकों में जन-जागरूकता फैलाना रहा। बीते साल आंगनबाड़ी सेविकाओं और आशा कार्यकर्ताओं को लोकसभा चुनाव की ड्यूटी पर लगाने के कारण जागरूकता अभियान प्रभावित हुआ था। कुछ लोग साल 2019 में मौत के आंकड़ों में उछाल को इससे जोड़कर देखते हैं। इस साल पहले से ही आंगनबाड़ी सेविकाओं व आशा कार्यकर्ताओं को जमीनी स्‍तर पर काम पर लगा दिया गया है।

बीमारी पर नियंत्रण को ले दो फ्रंट पर हो रहा काम

स्‍वास्‍थ्‍य विभाग चमकी बुखार पर नियंत्रण काे लेकर दो फ्रंट पर काम कर रहा है। पहला- लोगों को जागरूक कर बीमारी के फैलाव पर काबू पाना और दूसरा- बीमारी हो जाने की स्थिति में समय रहते प्रभावी इलाज कर मौत को रोकना। इसके लिए गांव से लेकर अस्‍पताल तक हर स्‍तर पर काम चल रहा है।

बीमारी का गरीबी, कुपोषण व गंदगी से दिखा रिश्‍ता

चमकी बुखार के 95 फीसद से अधिक मामले गरीब तबके के बच्चों में मिले हैं। इसका गरीबी, कुपोषण व गंदगी से रिश्‍ता देखा गया है। अधिकांश पीडि़त बच्‍चे रात में खाली पेट सोने वाले रहे हैं। मतलब यह कि अगर सरकार की कल्‍याणकारी योजनाएं धरातल पर उतार कर कुपोषण की समस्‍या दूर कर दी जाए तथा लोगों को स्‍वच्‍छ व सुरक्षित वातवरण में रहने को लेकर जागरूक किया जाए तो बीमारी पर आधा नियंत्रण किया जा सकता है। यह काम जारी है। जिलाधिकारी डॉ. चंद्रशेखर सिंह बताते हैं कि बीमारी से प्रभाव क्षेत्र के 169 गांवों को अधिकारियों ने गोद लिया है। संबंधित अधिकारी वहां जागरूकता के साथ गरीबों को मिलने वाले सरकारी योजनाओ के लाभ की भी पड़ताल कर रहे हैं। जिलाधिकारी गांवों से लेकर अस्‍पतालों तक हर स्तर पर सजगता का दावा करते हैं।



जमीनी स्‍तर पर चलाया जा रहा जागरूकता अभियान

जमीनी स्‍तर पर चलाए जा रहे इस जागरूकता अभियान में आंगनबाड़ी सेविका व सहायिका, आशा कार्यकर्ता तथा विकास मित्र घर-घर घूम रहे हैं। हर आंगनबाड़ी केंद्र पर कोर कमेटी गठित की गई है। पर्याप्त मात्रा में ओआरएस व पैरासिटामोल दवाएं उपलब्ध करायी गई हैं। पंचायत स्तर पर वाट्सऐप ग्रुुप भी बनाए गए हैं। बीमार बच्‍चे को तत्‍काल अस्‍पताल पहुंचाने के लिए एंबुलेंस तथा इसके नहीं रहने पर स्‍थानीय स्‍तर पर गाड़ी की भी व्‍यवस्‍था की गई है। इन तैयारियों का ही असर है कि हाल में मुजफ्फरपुर के मीनापुर प्रखंड के एक बीमार बच्‍चे को आंगनबाडी सेविकाओं ने तुरंत अस्पताल पहुंचा कर उसकी जान बचा ली। डीएम डॉ.चंद्रशेखर सिंह ने उनकी हौसला आफजाई की थी।

प्राथमिकता बीमारी से बचाव की, इलाज की भी पूरी व्‍यवस्‍था

प्राथमिकता बीमारी से बचाव की है, लेकिन इलाज की भी पूरी व्‍यवस्‍था की गई है। एसकेएमसीएच के अधीक्षक डॉ. सुनील शाही तैयारियों को संतोषजनक मानते हैं। बताते हैं कि इलाज के लिए विशेष वार्ड काम कर रहा है। प्रोटोकॉल के साथ इलाज चल रहा है। कहते हैं कि कोरोना के कारण पीकू वार्ड (Paediatric Intensive Care Units) के निर्माण में विलंब हुआ, लेकिन वह भी जल्‍द ही तैयार हो जाएगा। जरूरी दवाएं व संसाधन की कमी नहीं। एसकेएमसीएच के शिशु रोग विभागाध्‍यक्ष डॉ. गोपाल शंकर साहनी भी तैयारियों को लेकर संतोष जताते हैं।



रिस्क लेने के मूड में नहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार

इस बीच बीमारी की दस्‍तक के बाद मुख्यमंत्री (CM) नीतीश कुमार (Nitish Kumar) कोई रिस्क लेने के मूड में नहीं हैं। उन्‍होंने स्‍वास्‍थ्‍य विभाग के अधिकारियों को इलाज की तैयारियों के साथ बीमारी की रोकथाम के लिए चिह्नित पॉकेट्स में जागरूकता अभियान चलाने का निर्देश दिया है। एसकेएमसीएच में पीकू (PICU) में सौ बेड की व्‍यवस्‍था को लेकर भी उन्‍होंने निर्देश दिया है।



हर सहायता काे तैयार केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय

चमकी बुखार की दस्‍तक के बाद केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन (Dr. Harsh Vardhan) ने भी राज्‍य के स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री मंगल पांडेय तथा स्‍वास्‍थ्‍य विभाग व प्रशासनिक अघिकारियों के साथ वीडियो कॉन्‍फ्रेंसिंग कर स्थिति की समीक्षा की। इस दौरान स्‍वास्‍थ्‍य राज्‍य मंत्री अश्विनी चौबे भी उपस्थित रहे। डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि स्थिति पर उनकी नजर है तथा वे राज्य सरकार से लगातार संपर्क में हैं। उन्होंने राज्‍य सरकार को स्थिति पर नजर रखने तथा समय रहते रोकथाम को ले कदम उठाने को कहा तथा केंद्र की तरफ से मदद का आश्‍वासन दिया है।

(इनपुट: अमरेंद्र तिवारी, मुजफ्फरपुर)
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Yeh vidhi ka vidhan hai.