Lockdown की सच्ची घटना

136 करोड़ की आबादी है देश की.!

अगर रोजाना 2 लाख test भी होंगे... तो आखिरी व्यक्ति का नंबर 19 साल बाद आएगा.!

इसलिए तुलसी/अदरक का काढ़ा पियो...
और बाकी यमराज पर छोड़ दो 😜 😄

जिंदगी ने एक बात तो
अच्छे से सीखा दी।

हम किसी के लिए
हमेशा खास नही रह सकते।🍃

दोस्तो......
एक नया मोबाइल खरीदना चाहता हू
सुझाव अपने पास रखो बस पैसे भेज दो
😝😜

मजबूरी में बोला गया झूठ
भगवान भी माफ कर देता है....
इसलिए लड़कियों की तारीफ करने में
कोई हर्ज नही......!!!!!
😝😜🙈🙈

एक बात समझ में नहीं आती कि..
पहले के जमाने में,
राक्षस लोग बिना बात के इतना हंसते क्यों थे...

मेरा=मेरे।
 बाबू =फादर (पापा)
सोना= सोना (गोल्ड)


मतलब मेरे पापा ( पिता श्री ) मेरे लिए
सोने से बढ़कर है🙏🙏
😉😄

कोई तो होगी जो मेरे पोस्ट देखकर
भागती हुई कमरे में जाके
बेड पे जम्प लगा के
लेट के पोस्ट पढ़ती होगी 🤗

लड़की: आज पापा ने मुझे तुम्हारे साथ

बाइक पर जाते देख लिया।

लड़का: ओह, फिर क्या हुआ?

लड़की: वही जिसका डर था।

 बस के किराये के पैसे वापस ले लिए।
 🤔😝😝😜😜

अभी का सीखा हुआ ज्ञान....
बीवी का झगडते वक्त मन कैसे भटकाये ?
सिर्फ इतना कहिये,

सुंदर हो तो कुछ भी बोलोगी क्या ?

ये 100% काम करता है ....

स्वयं का दर्द महसूस होना,
जीवित होने का प्रमाण है..

 लेकिन औरों के दर्द भी महसूस करना,
इंसान होने का प्रमाण है...

मेडिकल साइंस चाहे जितनी भी
तरक्की कर ले,


लेकिन गिरफ्तारी से पहले लोगों के..

"सीने में होने वाले दर्द "


को नहीं रोक सकती
😝😝😜😜

पत्नी - पार्टी में इधर उधर देखा तो टांगे तोड़ दूँगी..
😬☹🙈

















पति - आँखे फोड़ देना ना,
बेचारी टांगो का क्या दोष..😝😝

पति ने गलती की

पत्नि ने गुस्सा किया

पति बोला "सॉरी" 😞

🔄↕

पत्नि ने गलती की

पति ने गुस्सा किया

"पत्नि रोने लगी"

पति बोला "सॉरी!" 😜

अल्फा बीटा गामा                                                                                        

और लड़कियों का Drama 😍              

मुझे लोक डाउन में भी समझ नहीं आया
😝😍

अगर कोई व्यक्ति आपसे
बात करने से पहले गुटखा थूक रहा है
तो समझ जाइए
वह बहुत ज्ञान की बात बताएगा

 😛ताज़ा अनुभव😛भारत के चौंकाने वाले आंकड़े पूरी दुनिया देख कर रह गई दंग-

संक्रमित 13430
ठीक हुए 1768
मृत्यु 448
और
टांग पर सूजन- 85,53,742

पिछवाङा लाल- 2,58,25,596

 भारतीय पुलिस का मूल मंत्र-

तोड़ देंगे शरीर का कोना कोना,
पर होने नहीं देंगे कोरोना।
😂😂

दूध के पावडर जैसा,

दारू पावडर आता है क्या ?
🙄😂😂

बताओ @JustinrexBot

मेरे चैनल के नौजवानों तुमसे एक सवाल है

बाबू स्त्रीलिंग है या पुल्लिंग प्लीज रिप्लाई दे कर जाना..!🤔🙄😒

Reply @JustinrexBot

बीवी:- कुकर की कितनी सिटी बजी?🤔

शौहर:- अरे मैने नहीं गिनी, मैं बॉस के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस में हूं...

बॉस:- तीन सिटी बजी, मैने गिनी हैं...
😂😂😝😝😂😂

इस lockdown में

.

.
कितने बेलन और चप्पल खाये

😆😆

लड़कियां मर तो सकती है
लेकिन किसी लड़के को धोखा नही दे सकती

बाकी झूट कल बोलूंगा..

🤣🤣🤣😝😝

बच्चे के गुम हो जाने पर
जो बहुत रोती है , 😥

और वो बच्चा फिर
अपने आप घर आ जाये तो उसे
तबियत से धोती है ।
"मां" की ममता समझ से परे होती है ।

😂😂

सुन पगली मैं गांव में और तू टाउन में।
..
वाह वाह वाह वाह
..
जिन्दगी बर्बाद हो गया इस लाॅकडाउन में।
प्रशांति निलयम में लिखा गया 'आज का सुविचार' १५ मई, २०२०

अपने अहंकार के वशीकरण जैसे कठिन कार्य को करने का सबसे अचूक तरीका क्या है? भगवान आज हमें बहुत प्रेम से समझाते हैं!

जब कोई पेट-दर्द से पीड़ित होता है, तो नमक और गर्म पानी के थैले से पेट की सिकाई ही उचित इलाज है, ना कि आँखों की कोई दवाई। ईश्वर की सार्वभौमिकता को स्वीकार करके, उसे अपने व्यक्तित्व में आत्मसात करते हुए अज्ञानता से उत्पन्न दु:ख को दूर किया जाना चाहिए। यह पहला चरण उतना आसान नहीं है जितना कि प्रतीत होता है। "मैं आपका हूँ", प्रभु के प्रति ऐसे मनोभाव का निरन्तर अभ्यास करें। मानव रुपी इस लहर को यह समझना और स्वीकार करना होगा कि वह समुद्र अर्थात प्रभु का ही एक अंग है। लहर यह अनुभव करने में बहुत लम्बा समय व्यतीत करती है कि नीचे स्थित विशाल समुद्र ही उसके अस्तित्व का एकमात्र कारण है। उसका शक्तिशाली अहंकार उसे विनम्र होने की अनुमति नहीं देता और समुद्र के सामने नतमस्तक होने में बाधक बन जाता है। "मैं आपका हूँ; आप मेरे स्वामी हैं। मैं एक दास हूँ; आप अधिपति हैं। मैं आपसे बंधा हुआ हूँ", ऐसा मानसिक दृष्टिकोण आपके अहंकार को शांत करेगा। यह मर्जला-किशोर नामक धर्मसंगत दृष्टिकोण जैसा ही है - जहाँ एक बिल्ली के बच्चे की, सफलता और अस्तित्व हेतु अपनी माँ पर निर्भरता, उसके अहंकार को नष्ट कर देती है।

- दिव्योद्बोधन ०८ सितम्बर, १९६३    

  टीम रेडियोसाई की प्रस्तुति

अपनी हर गतिविधि को सार्थक बनाएँ - बाबा
प्रशांति निलयम में लिखा गया 'आज का सुविचार' १६ मई, २०२०

माया का कारण क्या है और हमें इसे कैसे दूर करना चाहिए? भगवान आज प्रेम से हमारा मार्गदर्शन करते हैं।

अपने व्यक्तिगत अस्तित्व की अज्ञानता से छुटकारा पाने के लिए, ‘मैं तुम्हारा हूँ’, इस धारणा का अभ्यास प्रथम चरण है। अगला चरण है - आप मेरे हैं, "जहाँ लहरें अपने अधिकारस्वरुप, समुद्र से सहायता की मांग करती है। प्रभु को व्यक्ति की रक्षा और मार्गदर्शन करने का कर्तव्य निर्वहन करना होता है। व्यक्ति महत्वपूर्ण है एवं रक्षा किये जाने योग्य है, और प्रभु, भक्त की आवश्यकता को पूरा करने के लिए बाध्य है। सूरदास ने कहा, “तुम मेरे हो; मैं तुम्हें नहीं छोड़ूंगा; मैं तुम्हें अपने ह्रदय में कैद कर लूँगा; तुम मुझे छोड़ कर नहीं जा सकोगे।" अगला चरण है: "आप मैं हूँ, अर्थात आप और मैं एक हैं" - परन्तु मैं एक छवि हूँ और आप वास्तविकता हैं। मेरा कोई अलग व्यक्तित्व नहीं है; कोई द्वैत नहीं है। सब एक ही हैं। द्वैतवाद एक भ्रम है।

- दिव्योद्बोधन ०८ सितम्बर, १९६३    

  टीम रेडियोसाई की प्रस्तुति

अपने भीतर दिव्य दृष्टि विकसित करें और सभी प्राणियों, वस्तुओं और गतिविधियों में प्रभु के दर्शन करें। यही इस मानव जन्म को सार्थक बनाता है - बाबा
प्रशांति निलयम में लिखा गया 'आज का सुविचार' १७ मई, २०२०

सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा या गुण कौन सा है, जिसका प्रत्येक आध्यात्मिक व्यक्ति को अभ्यास करना चाहिए? भगवान आज भी हमें प्रेम से स्मरण कराते हैं।

कुछ ही क्षणों के विचार सांसारिक धन, प्रसिद्धि या सुख के खोखलेपन के प्रति किसी भी व्यक्ति को आकर्षित कर सकते हैं। जब सरोवर भरा होता है, तो सैकड़ों मेंढक चारों तरफ से उसे घेर लेते हैं, अर्थात जब आप संपन्न होते हैं, तो हर कोई आपकी प्रशंसा करता है। वहीं जब सरोवर सूख जाता है, तो एक मेंढक भी आस पास नहीं भटकता। एक कहावत है कि, यदि एक मृत शरीर आभूषणों से आच्छादित हो, तो कई लोग मृत व्यक्ति के सगे-संबंधी होने का दावा करेंगे; परन्तु यदि उस शरीर पर कोई मूल्यवान वस्तु नहीं है, तो कोई भी व्यक्ति उसके लिए विलाप नहीं करेगा! जब आप अधिक से अधिक धन संचय कर रहे हों, तो विचार करें कि क्या आप अपने और अपने बच्चों के लिए कष्ट तो जमा नहीं कर रहे हैं, जिससे आपके बच्चों के लिए एक स्वच्छ, आरामदायक और सम्मान जनक जीवन जीना कठिन हो जायेगा। इस पर प्रतिबिंबित करने पर आपको ज्ञात होगा कि हर जगह केवल ऐसे ही व्यक्ति सम्मानित होते हैं, जिन्होंने त्याग किया है, और सांसारिकता के मार्ग की तुलना में, ईश्वर-प्राप्ति हेतु अधिक कठिन मार्ग पर चले हैं। इंद्रियों के बंधन को त्यागने के लिए आप में दृढ़ वैराग्य भाव होना चाहिए।

- दिव्योद्बोधन ०८ सितम्बर, १९६३  

   टीम रेडियोसाई की प्रस्तुति

आध्यात्मिक जीवन का प्रथम संकेत वैराग्य है - बाबा

पापा पापा मुझे चोट लग गई खून आ रहा है

5 साल के बच्चे के मुँह से सुनना था
कि पापा सब कुछ छोड़ छाड़ कर
गोदी में उठाकर एक किलो मीटर की दूरी पर क्लिनिक तक भाग भाग कर ही पहुँच गए

दुकान कैश काउंटर सब नौकर के भरोसे छोड़ आये

सीधा डाक्टर के केबिन में दाखिल होते हुए डॉक्टर को बोले
देखिये देखिये डॉक्टर
मेरे बेटे को क्या हो गया

डॉक्टर साहब ने देखते हुए कहा
अरे भाई साहब घबराने की कोई बात
है मामूली चोट है.... ड्रेसिंग कर दी है
ठीक हो जायेगी।

डॉक्टर साहब कुछ पेन किलर लिख देते दर्द कम हो जाता । अच्छी से अच्छी दवाईया लिख देते ताकि
जल्दी ठीक हो जाये घाव भर जाये
डाक्टर अरे भाई साहब क्यों इतने परेशान हो रहे हो कुछ नहीं हुआ है
3-4दिन में ठीक हो जायेगा

पर डॉक्टर साहब इसको रात को नींद तो आजायेगी ना ।

डॉक्टर अरे हाँ भाई हाँ आप चिंता मत करो। बच्चे को लेकर लौटे तो नौकर बोला सेठ जी आपका ब्रांडेड महंगा शर्ट खराब हो गया खून लग गया अब
ये दाग नही निकलेंगे

भाई साहब कोई नहीं
ऐसे शर्ट बहुत आएंगे जायेंगे मेरे बेटे का खून बह गया वो चिंता खाये जा रही है कमजोर नहीं हो जाये । तू जा एक काम कर थोड़े सूखे मेवे फ्रूट ले आ इसे खिलाना पड़ेगा और मैं चलता हूँ घर पर

40 साल बाद

दुकान शोरूम में तब्दील हो गई है

 भाई साहब का बेटा बिज़नस बखूबी संभाल रहा है
 भाई साहब रिटायर्ड हो चुके हैं घर पर ही रहते है
तभी घर से बेटे की बीवी का फोन आता है

बीवी 📞अजी सुनते हो ये आपके पापा पलंग से गिर गए हैं
सर पर से खून आ रहा है

लड़का 📱 अरे यार ये पापा भी न
इनको बोला ह जमीन पर सो जाया करो पर मानते हीे नही पलंग पर ही सोते है  

अरे रामु काका जाओ तो घर पर पापा को डॉक्टर अंकल के पास ले कर आओ मैं मिलता हूँ वहीँ पर।

बूढ़े हो चुके रामु काका चल कर धीरे धीरे घर जाते है
तब तक सेठजी का काफी खून बह चुका था

बहु मुँह चढ़ा कर बोली
ले जाओ जल्दी पूरा महंगा कालीन खराब हो गया है

 काका जैसे तैसे जल्दी से रिक्शा में सेठजी को डाल कर
क्लीनिक ले गए

बेटा अब तक नही पंहुचा था
काका ने फोन किया तो बोला
अरे यार वो कार की चाबी नही मिल रही थी अभी मिली है
थोड़े कस्टमर भी है आप बैठो लेकर मैं आता हूँ

जो दूरी 40 साल पहले एक बाप ने
बेटे के सर पर खून देखकर 10 मिनट में बेटे को गोदी में उठा कर भाग कर तय कर ली थी

बेटा 1घन्टा 10 मिनट में कार से भी तय नही कर पाया था

 डाक्टर ने जैसे ही भाई साहब को देखा उनको अंदर ले गए इलाज चालू किया
तब तक बेटा भी पहुँच गया
डॉक्टर अंकल बोले
बेटे खून बहुत बह गया है
एडमिट कर देते तो ठीक रहता

बेटा अरे कुछ नही डाक्टर साहब
आप ड्रेसिंग कर दो ठीक हो जायेगा
2-4 दिन में ।

डाक्टर अंकल बोले ठीक है कुछ दवाईया लिख देता हूँ थोड़ी महंगी है लेकिन आराम जल्दी हो जायेगा

लड़का अरे डॉक्टर अंकल चलेगा 4-5 दिन ज्यादा लगेंगे तो अब इतनी महंगी दवाइयो की क्या जरूरत । चलो मुझे निकलना पड़ेगा शोरूम पर कोई नहीं है ।

ये सुनते ही डॉक्टर अंकल के सब्र का बांध टूट गया
और 40 साल पहले की घटना पूरी सुनाई

बेटे की आँखों आंसू बहने लगे उसे बहुत पस्च्याताप हुआ।

तभी बहू का फोन आया
वो महंगा कालीन खराब हो गया है
क्या करूँ ।

बेटा बोला कालीन ही खराब हुआ है ना .....
नया आजायेगा
तुम पलंग पर नया चद्दर और गद्दा डालो मैँ पापा को ले कर आ रहा हूँ

भाई साहब के आँखों में आँसू थे
और ये ख़ुशी के थे

चोट का दर्द गायब था बेटे
के अपनेपन ने सब भुला दिया।

बस अब तो मौत भी आ जाये तो
मंजूर है ।

दोस्तों ये आज की सच्चाई है
आज हमारे अंदर का इंसान मर चुका है ।

माँ बाप अकेलेपन का जीवन जी
रहे हैं

और

बेटा कामयाबी और दौलत
की चकाचौंध में खो कर सब कुछ भूल चुका है ।
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मुट्ठी भर लोग! :
साहस पर कहानी

हर साल गर्मी की छुट्टियों में नितिन अपने दोस्तों के साथ किसी पहाड़ी इलाके में माउंटेनियरिंग के लिए जाता था. इस साल भी वे इसी मकसद से ऋषिकेश पहुंचे.

गाइड उन्हें एक फेमस माउंटेनियरिंग स्पॉट पर ले गया. नितिन और उसके दोस्तों ने सोचा नहीं था कि यहाँ इतनी भीड़ होगी. हर तरफ लोग ही लोग नज़र आ रहे थे.

एक दोस्त बोला, ” यार यहाँ तो शहर जैसी भीड़ है…यहाँ चढ़ाई करने में क्या मजा??”

“क्या कर सकते हैं… अब आ ही गए हैं तो अफ़सोस करने से क्या फायदा…चलो इसी का मजा उठाते हैं…”, नितिन ने जवाब दिया.

सभी दोस्त पर्वतारोहण करने लगे और कुछ ही समय में पहाड़ी की चोटी पर पहुँच गए.

वहां पर पहले से ही लोगों का तांता लगा हुआ था. दोस्तों ने सोचा चलो अब इसी भीड़ में दो-चार घंटे कैम्पिंग करते हैं और फिर वापस चलते हैं. तभी नितिन ने सामने की एक चोटी की तरफ इशारा करते हुए कहा, “रुको-रुको… ज़रा उस चोटी की तरफ भी तो देखो… वहां तो बस मुट्ठी भर लोग ही दिख रहे हैं… कितना मजा आ रहा होगा… क्यों न हम वहां चलें.”

“वहां!”, एक दोस्त बोला, “अरे वहां जाना सबके बस की बात नहीं है… उस पहाड़ी के बारे में मैंने सुना है, वहां का रास्ता बड़ा मुश्किल है और कुछ लकी लोग ही वहां तक पहुँच पाते हैं.”

बगल में खड़े कुछ लोगों ने भी नितिन का मजाक उड़ाते हुए कहा,” भाई अगर वहां जाना इतना ही आसान होता तो हम सब यहाँ झक नहीं मार रहे होते!”

लेकिन नितिन ने किसी की बात नहीं सुनी और अकेला ही चोटी की तरफ बढ़ चला. और तीन घंटे बाद वह उस पहाड़ी के शिखर पर था.

वहां पहुँचने पर पहले से मौजूद लोगों ने उसका स्वागत किया और उसे एंकरेज किया.

नितिन भी वहां पहुँच कर बहुत खुश था अब वह शांति से प्रकृति की ख़ूबसूरती का आनंद ले सकता था.

जाते-जाते नितिन ने बाकी लोगों से पूछा,”एक बात बताइये… यहाँ पहुंचना इतना मुश्किल तो नहीं था, मेरे ख़याल से तो जो उस भीड़-भाड़ वाली चोटी तक पहुँच सकता है वह अगर थोड़ी सी और मेहनत करे तो इस चोटी को भी छू सकता है…फिर ऐसा क्यों है कि वहां सैकड़ों लोगों की भीड़ है और यहाँ बस मुट्ठी भर लोग?”

वहां मौजूद एक वेटरन माउंटेनियर बोला, “क्योंकि ज्यादातर लोग बस उसी में खुश हो जाते हैं जो उन्हें आसानी से मिल जाता…वे सोचते ही नहीं कि उनके अन्दर इससे कहीं ज्यादा पाने का पोटेंशियल है… और जो थोड़ा पाकर खुश नहीं भी होते वे कुछ अधिक पाने के लिए रिस्क नहीं उठाना चाहते… वे डरते हैं कि कहीं ज्यादा के चक्कर में जो हाथ में है वो भी ना चला जाए… जबकि हकीकत ये है कि अगली चोटी या अगली मंजिल पाने के लिए बस जरा से और एफर्ट की ज़रुरत पड़ती है! पर साहस ना दिखा पाने के कारण अधिकतर लोग पूरी लाइफ बस भीड़ का हिस्सा ही बन कर रह जाते हैं… और साहस दिखाने वाली उन मुट्ठी भर लोगों को लकी बता कर खुद को तसल्ली देते रहते हैं.”

Friends, अगर आप आज तक वो अगला साहसी कदम उठाने से खुद को रोके हुए हैं तो ऐसा मत करिए क्योंकि-

अगली चोटी या अगली मंजिल पाने के लिए बस जरा से और एफर्ट की ज़रुरत पड़ती है!

खुद को उस effort को करने से रोकिये मत … थोडा सा साहस… थोड़ी सी हिम्मत आपको भीड़ से निकाल कर उन मुट्ठी भर लोगों में शामिल कर सकती है जिन्हें दुनिया lucky कहती है.
इस लॉकडाउन की एक सच्ची घटना, जो शायद आप सबको आश्चर्यचकित कर दे .. 😱

हम लोग पिछले कई दिनों से इस जगह पर खाना बाँट रहे थे। मगर हैरानी की बात ये थी कि आजकल एक कुत्ता हर रोज आता था और किसी न किसी के हाथ से खाने का पैकेट छीनकर ले जाता था।

आज हमने एक आदमी की ड्यूटी भी लगाई थी कि खाने को लेने के चक्कर में कुत्ता किसी आदमी को न काट ले ...

लगभग ग्यारह बजे का समय हो चुका था और हम लोग अपना खाना वितरण शुरू कर चुके थे। तभी देखा कि वह कुत्ता तेजी से आया और एक आदमी के हाथ से खाने की थैली झपटकर भाग गया।

वह लड़का जिसकी ड्यूटी थी कि कोई जानवर किसी पर हमला न कर दे, वह डंडा लेकर उस कुत्ते का पीछा करते हुए कुत्ते के पीछे भागा।

कुत्ता भागता हुआ थोड़ी दूर एक झोंपड़ी में घुस गया।वह आदमी भी उसका पीछा करता हुआ झोंपड़ी तक आ गया।कुत्ता खाने की थैली झोंपड़ी में रख के बाहर आ चुका था।

वह आदमी बहुत हैरान था।वह झोंपड़ी में घुसा तो देखा कि एक आदमी अंदर लेटा हुआ है। चेहरे पर बड़ी सी दाढ़ी है और उसका एक पैर भी नहीं है। और जिस्म पर गंदे से कपड़े थे उसके। मानो कई दिनों से नहाया भी नहीं हो।

 वो लड़का बोला - "ओ भैया! ये कुत्ता तुम्हारा है क्या ..?"

"मेरा कोई कुत्ता नहीं है।कालू तो मेरा बेटा है। उसे कुत्ता मत कहो।"
अपंग बोला।

"अरे भाई !हर रोज खाना छीनकर भागता है वो। किसी को काट लिया तो ऐसे में कहाँ डॉक्टर मिलेगा ...
उसे बांध के रखा करो।और हां जहां तक खाने की बात है तो कल से मैं खुद तुम्हे दे जाऊंगा तुम्हें। "उस लड़के ने कहा।

"बात खाने की नहीं है।
मैं उसे मना नहीं कर सकूँगा। मेरी भाषा भले ही न समझता हो लेकिन मेरी भूख को समझता है साहब।

जब मैं घर छोड़ के आया था तब से यही मेरे साथ है।मैं नहीं कह सकता कि मैंने उसे पाला है या उसने मुझे पाला है। मेरे तो बेटे से भी बढ़कर है। मैं तो रेड लाइट पर पैन बेचकर अपना गुजारा करता हूँ ... पर आजकल सब बंद जो है।"🤔

वह लड़का एकदम मौन हो गया। उसे ये संबंध समझ ही नहीं आ रहा था।उस आदमी ने खाने का पैकेट खोला और आवाज लगाई, "कालू ! ओ बेटा कालू ... आ जा खाना खा ले।"

कुत्ता दौड़ता हुआ आया और उस आदमी का मुँह चाटने लगा।खाने को उसने सूंघा भी नहीं। उस आदमी ने खाने की थैली खोली और पहले कालू का हिस्सा निकाला,फिर अपने लिए खाना रख लिया।

"खाओ बेटा !"उस आदमी ने कुत्ते से कहा।मगर कुत्ता उस आदमी को ही देखता रहा।तब उसने अपने हिस्से से खाने का निवाला लेकर खाया। उसे खाते देख कुत्ते ने भी खाना शुरू कर दिया।

दोनों खाने में व्यस्त हो गए।उस लड़के के हाथ से डंडा छूटकर नीचे गिर पड़ा था।जब तक दोनों ने खा नहीं लिया वह अपलक उन्हें ही देखता रहा।

"भैया जी ! आप भले गरीब हों ,मजबूर हों,मगर आपके जैसा बेटा किसी के पास नहीं होगा।" उसने जेब से पैसे निकाले और उस भिखारी के हाथ में रखने चाहे।

"रहने दो भाई, किसी और को ज्यादा जरूरत होगी इनकी। मुझे तो कालू ला ही देता है। मेरे बेटे के रहते मुझे कोई चिंता नहीं।" एक संतोष की लहर उस इनसान के चेहरे पर साफ देखी जा सकती थी उस पल,

वह लड़का हैरान था कि आज एक पुत्र भी, ऐसा नहीं कर सकता और तो और आज इंसान इनसान से छीनने को आतुर है, और ये निहित महज कुत्ता ...?😳

अपने पालनहार की, उसकी लाचारी में पुत्र धर्म का अजूबा रोल निभा रहा है।

बिना अपने मालिक के खाये तो.. खाना भी नहीं खाता है। वो बेवाक देखता रह गया फिर उसने अपने सिर को ज़ोर से झटका दिया और अंततः जिंदगी के इस सिलसिले पर विचार करते हुवे वापस चला आया।

अब उसके हाथ में कोई डंडा नहीं था।
प्यार पर कोई वार कर भी कैसे सकता है ... और ये ही तो प्यार की असल पराकाष्ठा थी।

वह लड़का भाव शून्य इस सोच में डूब गया कि आज जहां मां - बाप आज बुढापे की लाठी के सहारे के तौर पर अपने बच्चो को पालते पोस कर बड़ा करते है वो ही बुढापे में उन्हें धोखा देकर उन्हें अपाहिज व पंगू बना छोड़ते हैं और एक ये निहित मूक कुत्ता था ...🤔

जो उन मतलबी संतानों से कहीं लाख दर्जे ऊपर था ।

याद रहे इतिहास हमेशा ही एपनेआप में दोहराया जाता है। क्यों ना फिर इंसान अपनी मनोवृति का आत्म चिंतन करे आखिर यांदे, स्मृति अच्छी और मीठी ही हो तो फिर इंसान की लाचारी किस बात की ...?

कल वो अपनी वृद्धावस्था में थे आज आप है और कल आपकी ओलाद इसी दौर में होगी। बस इक सोच का ही तो फ़र्क है।

आओ क्यों ना इस सिलसिले में अजब परिवर्तन लाए।

🙏🙏

🌹🌹🌹🌸🌹🌹🌸🌹🌹🌸🌹🌹🌹

दोस्तों ,नमस्कार

 हमेशा सकारात्मक सोच रखे

✍1.जीवन

जब तुम पैदा हुए थे तो तुम रोए थे जबकि पूरी दुनिया ने जश्न मनाया था। अपना जीवन ऐसे जियो कि तुम्हारी मौत पर पूरी दुनिया रोए और तुम जश्न मनाओ।

✍2.कठिनाइयों

जब तक आप अपनी समस्याओं एंव कठिनाइयों की वजह दूसरों को मानते है, तब तक आप अपनी समस्याओं एंव कठिनाइयों को मिटा नहीं सकते।

✍3.असंभव

इस दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं| हम वो सब कर सकते है, जो हम सोच सकते है और हम वो सब सोच सकते है, जो आज तक हमने नहीं सोचा।

✍4.हार ना मानना

बीच रास्ते से लौटने का कोई फायदा नहीं क्योंकि लौटने पर आपको उतनी ही दूरी तय करनी पड़ेगी जितनी दूरी तय करने पर आप लक्ष्य तक पहुँच सकते है।

✍5.हार जीत

सफलता हमारा परिचय दुनिया को करवाती है और असफलता हमें दुनिया का परिचय करवाती है।

✍6.आत्मविश्वास

अगर किसी चीज़ को दिल से चाहो तो पूरी कायनात उसे तुमसे मिलाने में लग जाती है।

✍7.महानता

महानता कभी न गिरने में नहीं बल्कि हर बार गिरकर उठ जाने में है।

✍8.गलतियां

अगर आप समय पर अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं करते है तो आप एक और गलती कर बैठते है| आप अपनी गलतियों से तभी सीख सकते है जब आप अपनी गलतियों को स्वीकार करते है।

✍9.चिन्ता

अगर आप उन बातों एंव परिस्थितियों की वजह से चिंतित हो जाते है, जो आपके नियंत्रण में नहीं तो इसका परिणाम समय की बर्बादी एवं भविष्य पछतावा है।

✍10.शक्ति

ब्रह्माण्ड की सारी शक्तियां पहले से हमारी हैं| वो हम हैं जो अपनी आँखों पर हाथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि कितना अन्धकार है|

✍11.मेहनत

हम चाहें तो अपने आत्मविश्वास और मेहनत के बल पर अपना भाग्य खुद लिख सकते है और अगर हमको अपना भाग्य लिखना नहीं आता तो परिस्थितियां हमारा भाग्य लिख देंगी|

✍12. सपने

सपने वो नहीं है जो हम नींद में देखते है, सपने वो है जो हमको नींद नहीं आने देते।

✍13.समय

आप यह नहीं कह सकते कि आपके पास समय नहीं है क्योंकि आपको भी दिन में उतना ही समय (24 घंटे) मिलता है जितना समय महान एंव सफल लोगों को मिलता है।

✍14.विश्वास

विश्वास में वो शक्ति है जिससे उजड़ी हुई दुनिया में प्रकाश लाया जा सकता है| विश्वास पत्थर को भगवान बना सकता है और अविश्वास भगवान के बनाए इंसान को भी पत्थर दिल बना सकता है।

✍16.सफलता

दूर से हमें आगे के सभी रास्ते बंद नजर आते हैं क्योंकि सफलता के रास्ते हमारे लिए तभी खुलते जब हम उसके बिल्कुल करीब पहुँच जाते है|

✍17.सोच

बारिश की दौरान सारे पक्षी आश्रय की तलाश करते है लेकिन बाज़ बादलों के ऊपर उडकर बारिश को ही avoid कर देते है। समस्याए common है, लेकिन आपका नजरिया इनमे difference पैदा करता है।

✍18. प्रसन्नता

यह पहले से निर्मित कोई चीज नहीं है..ये आप ही के कर्मों से आती है।

आज का दिन मंगलमय हो।

🌹🌹🌹🌹🌹🌹

🌄मै गाँव हूँ

     मैं गाँव हूँ
मैं वहीं गाँव हूँ जिसपर ये आरोप है कि यहाँ रहोगे तो भूखे मर जाओगे।
मैं वहीं गाँव हूँ जिस पर आरोप है कि यहाँ अशिक्षा रहती है..

मैं वहीं गाँव हूँ जिस पर असभ्यता और जाहिल गवाँर का भी आरोप है

हाँ मैं वहीं गाँव हूँ जिस पर आरोप लगाकर मेरे ही बच्चे मुझे छोड़कर दूर बड़े बड़े शहरों में चले गए।

      जब मेरे बच्चे मुझे छोड़कर जाते हैं मैं रात भर सिसक सिसक कर रोता हूँ ,फिर भी मरा नही।मन में एक आश लिए आज भी निर्निमेष पलकों से बांट जोहता हूँ शायद मेरे बच्चे आ जायँ ,देखने की ललक में सोता भी नहीं हूँ
लेकिन हाय!जो जहाँ गया वहीं का हो गया।

मैं पूछना चाहता हूँ अपने उन सभी बच्चों से क्या मेरी इस दुर्दशा के जिम्मेदार तुम नहीं हो?
अरे मैंने तो तुम्हे कमाने के लिए शहर भेजा था और तुम मुझे छोड़ शहर के ही हो गए।मेरा हक कहाँ है?
क्या तुम्हारी कमाई से मुझे घर,मकान,बड़ा स्कूल, कालेज,इन्स्टीट्यूट,अस्पताल,आदि बनाने का अधिकार नहीं है?ये अधिकार मात्र शहर को ही क्यों ? जब सारी कमाई शहर में दे दे रहे हो तो मैं कहाँ जाऊँ?मुझे मेरा हक क्यों नहीं मिलता?

इस कोरोना संकट में सारे मजदूर गाँव भाग रहे हैं,गाड़ी नहीं तो सैकड़ों मील पैदल बीबी बच्चों के साथ चल दिये आखिर क्यों?जो लोग यह कहकर मुझे छोड़ शहर चले गए थे कि गाँव में रहेंगे तो भूख से मर जाएंगे,वो किस आश विस्वास पर पैदल ही गाँव लौटने लगे?मुझे तो लगता है निश्चित रूप से उन्हें ये विस्वास है कि गाँव पहुँच जाएंगे तो जिन्दगी बच जाएगी,भर पेट भोजन मिल जाएगा, परिवार बच जाएगा।सच तो यही है कि गाँव कभी किसी को भूख से नहीं मारता ।

आओ मुझे फिर से सजाओ,मेरी गोद में फिर से चौपाल लगाओ,मेरे आंगन में चाक के पहिए घुमाओ,मेरे खेतों में अनाज उगाओ,खलिहानों में बैठकर आल्हा खाओ,खुद भी खाओ दुनिया को खिलाओ,महुआ ,पलास के पत्तों को बीनकर पत्तल बनाओ,गोपाल बनो,मेरे नदी ताल तलैया,बाग,बगीचे गुलजार करो, बड़े बुजुर्गो की दांती पीस पीस कर प्यार भरी गालियाँ, अपने काका के उटपटांग डायलाग, अपनी चाची ताई और दादी की अपनापन वाली खीज और पिटाई, रामबाबू हलवाई की मिठाई कल्लो ठाकुर की हजामत और मोची की दुकान,भड़भूजे की सोंधी महक,चना बथुआ का रायता बाजरा की रोटी दही छाच और गुड सक्कर ये सब आज भी तुम्हे पुकार रहे है।

मैं तनाव भी कम करने का कारगर उपाय हूँ।मैं प्रकृति के गोद में जीने का प्रबन्ध कर सकता हूँ।मैं सब कुछ कर सकता हूँ !बस तू समय समय पर आया कर मेरे पास,अपने बीबी बच्चों को मेरी गोद में डाल कर निश्चिंत हो जा,दुनिया की कृत्रिमता को त्याग दें।फ्रीज का नहीं घड़े का पानी पी,त्यौहारों समारोहों में पत्तलों में खाने और कुल्हड़ों में पीने की आदत डाल,अपने मोची के जूते,और दर्जी के सिरे कपड़े पर इतराने की आदत डाल,हलवाई की मिठाई,खेतों की हरी सब्जियाँ,फल फूल,गाय का दूध ,बैलों की खेती पर विस्वास रख कभी संकट में नहीं पड़ेगा।हमेशा खुशहाल जिन्दगी चाहता है तो मेरे लाल मेरी गोद में आकर कुछ दिन खेल लिया कर तू भी खुश और मैं भी खुश।

बोध कथा:
"ईर्ष्या-द्वेष आपके मन पर बोझ है इन्हें निकाल फेंकें"

एक बार एक महात्मा ने अपने शिष्यों से अनुरोध किया कि वे कल से प्रवचन में आते समय अपने साथ एक थैली में बडे़ आलू साथ लेकर आयें, उन आलुओं पर उस व्यक्ति का नाम लिखा होना चाहिये जिनसे वे ईर्ष्या करते हैं । जो व्यक्ति जितने व्यक्तियों से घृणा करता हो, वह उतने आलू लेकर आये । अगले दिन सभी लोग आलू लेकर आये, किसी पास चार आलू थे,

 किसी के पास छः या आठ और प्रत्येक आलू पर उस व्यक्ति का नाम लिखा था जिससे वे नफ़रत करते थे । अब महात्मा जी ने कहा कि, अगले सात दिनों तक ये आलू आप सदैव अपने साथ रखें, जहाँ भी जायें, खाते-पीते, सोते-जागते, ये आलू आप सदैव अपने साथ रखें ।

 शिष्यों को कुछ समझ में नहीं आया कि महात्मा जी क्या चाहते हैं, लेकिन महात्मा के आदेश का पालन उन्होंने अक्षरशः किया । दो-तीन दिनों के बाद ही शिष्यों ने आपस में एक दूसरे से शिकायत करना शुरू किया, जिनके आलू ज्यादा थे, वे बडे कष्ट में थे ।

जैसे-तैसे उन्होंने सात दिन बिताये, और शिष्यों ने महात्मा की शरण ली । महात्मा ने कहा, अब अपने-अपने आलू की थैलियाँ निकालकर रख दें, शिष्यों ने चैन की साँस ली । महात्माजी ने पूछा – विगत सात दिनों का अनुभव कैसा रहा ?

 शिष्यों ने महात्मा से अपनी आपबीती सुनाई, अपने कष्टों का विवरण दिया, आलुओं की बदबू से होने वाली परेशानी के बारे में बताया, सभी ने कहा कि बडा हल्का महसूस हो रहा है… महात्मा ने कहा – यह अनुभव मैने आपको एक शिक्षा देने के लिये किया था…

 जब मात्र सात दिनों में ही आपको ये आलू बोझ लगने लगे, तब सोचिये कि आप जिन व्यक्तियों से ईर्ष्या या नफ़रत करते हैं, उनका कितना बोझ आपके मन पर होता होगा, और वह बोझ आप लोग तमाम जिन्दगी ढोते रहते हैं, सोचिये कि आपके मन और दिमाग की इस ईर्ष्या के बोझ से क्या हालत होती होगी ?

यह ईर्ष्या तुम्हारे मन पर अनावश्यक बोझ डालती है, उनके कारण तुम्हारे मन में भी बदबू भर जाती है, ठीक उन आलुओं की तरह…. इसलिये अपने मन से इन भावनाओं को निकाल दो,

 🔱यदि आप किसी से प्यार नहीं कर सकते तो कम से कम नफ़रत और ईर्ष्या मत कीजिये, तभी आपका मन स्वच्छ, निर्मल और हल्का बना रहेगा, वरना जीवन भर इनको ढोते-ढोते आपका मन और आपकी मानसिकता दोनों बीमार हो जाएँगी।

#जरुरत_है_ऐसी_माँ_की_आज_के_इस_समाज_में?

मैं नहीं सिखा पाऊँगी अपनी बेटी को बर्दाश्त करना एक ऐसे आदमी को जो उसका सम्मान न कर सके।

 कैसे सिखाए कोई माँ अपनी फूल सी बच्ची को कि पति की मार खाना सौभाग्य की बात है?

 मैंने तो सिखाया है कोई एक मारे तो तुम चार मारो।

हाँ, मैं बेटी का घर बिगाड़ने वाली बुरी माँ हूँ, .........

लेकिन नहीं देख पाऊँगी उसको दहेज के लिए बेगुनाह सा लालच की आग में जलते हुए।

मैं विदा कर के भूल नहीं पाऊँगी, अक्सर उसका कुशल पूछने आऊँगी। हर अच्छी-बुरी नज़र से, ब्याह के बाद भी उसको बचाऊँगी।

 बिटिया को मैं विरोध करना सिखाऊँगी।

ग़लत मतलब ग़लत होता है, यही बताऊँगी। देवर हो, जेठ हो, या नंदोई, पाक नज़र से देखेगा तभी तक होगा भाई।

ग़लत नज़र को नोचना सिखाऊँगी, ढाल बनकर उसकी ब्याह के बाद भी खड़ी हो जाऊँगी।

 “डोली चढ़कर जाना और अर्थी पर आना”, ऐसे कठिन शब्दों के जाल में उसको नहीं फसाऊँगी।

बिटिया मेरी पराया धन नहीं, कोई सामान नहीं जिसे गैरों को सौंप कर गंगा नहाऊँगी।

अनमोल है वो अनमोल ही रहेगी।

रुपए-पैसों से जहाँ इज़्ज़त मिले ऐसे घर में मैं अपनी बेटी नहीं ब्याहुँगी।

औरत होना कोई अपराध नहीं, खुल कर साँस लेना मैं अपनी बेटी को सिखाऊँगी।

मैं अपनी बेटी को अजनबी नहीं बना पाऊँगी।

हर दुःख-दर्द में उसका साथ निभाऊँगी, ज़्यादा से ज़्यादा एक बुरी माँ ही तो कहलाऊँगी।

#सुन्दर_कथन

बोध कथा:
"आदमी का कीमत"

एक बार एक आदमी महात्मा बुद्ध के पास पहुंचा। उसने पुछा- ''प्रभू, मुझे यह जीवन क्यों मिला? इतनी बड़ी दुनिया में मेरी क्या कीमत है?'' बुद्ध उसकी बात सुनकर मुस्कराए और उसे एक चमकीला पत्थर देते हुए बोले, ''जाओ, पहले इस पत्थर का मूल्य पता करके आओ। पर ध्यान रहे, इसे बेचना नहीं, सिर्फ मूल्य पता करना है।''

वह आदमी उस पत्थर को लेकर एक आम वाले के पास पहुंचा और उसे पत्थर दिखाते हुए बोला, ''इसकी कीमत क्या होगी?'' आम वाला पत्थर की चमक देखकर समझ गया कि अवश्य ही यह कोई कीमती पत्थर है। लेकिन वह बनावटी आवाज में बोला, देखने में तो कुछ खास नहीं लगता, पर मैं इसके बदले 10 आम दे सकता हूं।'' वह आदमी आगे बढ़ गया। सामने एक सब्जीवाला था।

उसने उससे पत्थर का दाम पूछा। सब्जी वाला बोला, ''मैं इस पत्थर के बदले एक बोरी आलू दे सकता हूं।'' आदमी आगे चल पड़ा। उसे लगा पत्थर कीमती है, किसी जौहरी से इसकी कीमत पता करनी चाहिए।

 वह एक जौहरी की दुकार पर पहुंचा और उसकी कीमती पूछी। जौहरी उसे देखते ही पहचान गया कि यह बेशकीमती रूबी पत्थर है, जो किस्मत वाले को मिलता है। वह बोला, ''पत्थर मुझे दे दो और मुझसे 01 लाख रू. ले लो।''

उस आदमी को अब तक पत्थर की कीमत का अंदाजा हो गया था। वह बुद्ध के पास लौटने के लिए मुड़ा। जौहरी उसे रोकते हुए बोला, ''अरे रूको तो भाई, मैं इसके 50 लाख दे सकता हूं।'' लेकिन वह आदमी फिरभी नहीं रूका।

जौहरी किसी कीमत पर उस पत्थर को अपने हाथ से नहीं जाने देना चाहता थाा वह उछल कर उसके आगे आ गया और हाथ जोड़ कर बोला, ''तुम यह पत्थर मुझे दे दो, मैं 01 करोड़ रूपये देने को तैयार हूं।''

 वह आदमी जौहरी से पीछा छुडा कर जाने लगा। जौहरी ने पीछे से आवाज लगाई, ''ये बेशकीमती पत्थर है, अनमोल है। तुम जितने पैसे कहोगे, मैं दे दूंगा।'' यह सुनकर वह आदमी हैरान-परेशान हो गया। वह सीधा बुद्ध के पास पहुंचा और उन्हें पत्थर वापस करते हुए सारी बात कह सुनाई।

 बुद्ध मुस्करा कर बोले, ''आम वाले ने इसकी कीमत '10 आम' लगाई, आलू वाले ने 'एक बोरी आलू' और जौहरी ने बताया कि 'अनमोल' है। इस पत्थर के गुण जिसने जितने समझे, उसने उसकी उतनी कीमत लगाई। ऐसे ही यह जीवन है। हर आदमी एक हीरे के समान है।

दुनिया उसे जितना पहचान पाती है, उसे उतनी महत्ता देती है। ...लेकिन आदमी और हीरे में एक फर्क यह है कि हीरे को कोई दूसरा तराशता है, और आदमी को खुद अपने आपको तराशना पड़ता है। ...तुम भी अपने आपको तराश कर अपनी चमक बिखेरो, तुम्हें भी तुम्हारी कीमत बताने वाले मिल ही जाएंगे।'

बोध कथा:
"अहंकार"

बहुत समय पहले की बात है| एक गाँव में एक मूर्तिकार ( मूर्ति बनाने वाला ) रहता था| वह ऐसी मूर्तियाँ बनता था, जिन्हें देख कर हर किसी को मूर्तियों के जीवित होने का भ्रम हो जाता था|

 आस-पास के सभी गाँव में उसकी प्रसिद्धि थी, लोग उसकी मूर्तिकला के कायल थे| इसीलिए उस मूर्तिकार को अपनी कला पर बड़ा घमंड था| जीवन के सफ़र में एक वक़्त एसा भी आया जब उसे लगने लगा की अब उसकी मृत्यु होने वाली है, वह ज्यादा समय तक जीवित नहीं रह पाएगा| उसे जब लगा की जल्दी ही उसकी मृत्यु होने वाली है तो वह परेशानी में पड़ गया| यमदूतों को भ्रमित करने के लिए उसने एक योजना बनाई|

उसने हुबहू अपने जैसी दस मूर्तियाँ बनाई और खुद उन मूर्तियों के बिच जा कर बेठ गया| यमदूत जब उसे लेने आए तो एक जैसी ग्यारह आकृतियों को देखकर दांग रह गए| वे पहचान नहीं कर पा रहे थे की उन मूर्तियों में से असली मनुष्य कौन है| वे सोचने लगे अब क्या किया जाए|

अगर मूर्तिकार के प्राण नहीं ले सके तो श्रथि का नियम टूट जाएगा और सत्य परखने के लिए मूर्तियों को तोड़ा गया तो कला का अपमान हो जाएगा| अचानक एक यमदूत को मानव स्वाभाव के सबसे बड़े दुर्गुण अहंकार को परखने का विचार आया| उसने मूर्तियों को देखते हुए कहा, “कितनी सुन्दर मूर्तियाँ बने है, लेकिन मूर्तियों में एक त्रुटी है| काश मूर्ति बनाने वाला मेरे सामने होता, तो में उसे बताता मूर्ति बनाने में क्या गलती हुई है”|

 यह सुनकर मूर्तिकार का अहंकार जाग उठा, उसने सोचा “मेने अपना पूरा जीवन मूर्तियाँ बनाने में समर्पित कर दिया भला मेरी मूर्तियों में क्या गलती हो सकती है”| वह बोल उठा “कैसी त्रुटी”… झट से यमदूत ने उसे पकड़ लिया और कहा “बस यही गलती कर गए तुम अपने अहंकार में, कि बेजान मूर्तियाँ बोला नहीं करती”…

 🔥कहानी का तर्क यही है, कि “इतिहास गवाह है, अहंकार ने हमेशा इन्सान को परेशानी और दुःख के सिवा कुछ नहीं दिया”|

🔥"उधार का अमीर"🔥

 🙊100 नम्बर की एक गाड़ी मेन रोड पर एक दो मंजिले मकान के बाहर आकर रुकी।

कांस्टेबल हरीश को फ़ोन पर यही पता लिखाया गया था। पर यहां तो सभी मकान थे। यहां पर खाना किसने मंगवाया होगा?
यही सोचते हुए हरीश ने उसी नम्बर पर कॉल बैक की।

    "अभी दस मिनट पहले इस नम्बर से भोजन के लिए फोन किया गया था।आप जतिन जी बोल रहे हैं क्या? हम मकान न0 112 के सामने खड़े हैं, कहाँ आना है?"
दूसरी तरफ से जबाब आया, "आप वहीं रुकिए, मैं आ रहा हूं।"

एक मिनट बाद 112 न0 मकान का गेट खुला और करीब पैंसठ वर्षीय सज्जन बाहर आए।

उन्हें देखते ही हरीश गुस्से में बोले,"आप को शर्म नही आई, इस तरह से फोन करके खाना मंगवाते हुए, गरीबों के हक का जब आप जैसे अमीर खाएंगे तो गरीब तक खाना कैसे पहुंचेगा? मेरा यहां तक आना ही बर्बाद गया।"

साहब ! ये शर्म ही थी जो हमें यहां तक ले आयी। सर्विस लगते ही शर्म के मारे लोन लेकर घर बनवा लिया। आधे से ज्यादा सेलरी क़िस्त में कटती रही और आधी बच्चों की परवरिश में जाती रही।
अब रिटायरमेंट के बाद कोई पेंशन नही थी तो मकान का एक हिस्सा किराये पर दे दिया। अब लाक डाउन के कारण किराया भी नही मिला। बेटे की सर्विस न लगने के कारण जो फंड मिला था उससे बेटे को व्यवसाय करवा दिया और वो जो भी कमाता गया व्यवसाय बड़ा करने के चक्कर में उसी में लगाता गया और कभी बचत करने के लिए उसने सोचा ही नही। अब 50 दिन से वो भी ठप्प है। पहले साल भर का गेंहू -चावल भर लेते थे पर बहू को वो सब ओल्ड फैशन लगता था तो शर्म के मारे दोनो टँकी कबाड़ी को दे दीं।

अब बाजार से दस किलो पैक्ड आटा और पांच किलो चावल ले आते हैं। राशन कार्ड बनवाया था तो बच्चे वहां से शर्म के मारे राशन उठाने नही जाते थे कि कौन लाइन लगाने जाय इसलिए वो भी निरस्त हो गया।जन धन अकाउंट हमने ही बहू का खोलवा दिया था, पर उसमें एक भी बार न तो जमा हुआ न ही निकासी हुई और खाता बन्द हो गया। इसलिये सरकार से आये हुए पैसे भी नही निकाल सके। मकान होने के कारण शर्म के मारे किसी सामाजिक संस्था से भी मदद नही मांग सकते थे। कल से जब कोई रास्ता नहीं दिखा और सुबह जब पोते को भूख से रोते हुए देखा तो सारी शर्म एक किनारे रख कर 112 डायल कर दिया।इन दीवारों ने हमको अमीर तो बना दिया साहब ! पर अंदर से खोखला कर दिया।मजदूरी कर नहीं सकते थे और आमदनी इतनी कभी हुई नही की बैंक में इतना जोड़ लेते की कुछ दिन बैठकर जीवन व्यतीत कर लेते। आप ही बताओ ! मैं क्या करता। कहते हुए जतिन जी फफक पड़े।

हरीश को समझ नहीं आ रहा था कि क्या बोले। वो चुपचाप गाड़ी तक गया और लंच पैकेट निकालने लगा। तभी उसे याद आया कि उसकी पत्नी ने कल राशन व घर का जो भी सामान मंगवाया था वो कल से घर न जा पाने के कारण डिग्गी में ही पड़ा हुआ है।उसने डिग्गी खोली, सामान निकाला और लंच पैकेट के साथ साथ सारा सामान जतिन के गेट पर रखा और बिना कुछ बोले गाड़ी में आकर बैठ गया। गाड़ी फिर किसी ऐसे ही भाग्यहीन अमीर का घर ढूंढने जा रही थी।

https://t.me/kjjbd

ये आज के मध्यम वर्ग की वास्तविक स्थिति है।

बोध कथा:
"अतीत कभी नहीं भूला - बिल गेटस"

एक छोटी सी प्रेरक कथा

___अतीत कभी नहीं भूला___

बिल गेटस सुबह के नाश्ते के लिए एक रेस्टोरेंट में पहुंचे।
जब उन्होंने नाश्ता समाप्त कर लिया और वेटर बिल ले आया, तब उन्होंने भुगतान के अलावा पांच डालर बतौर टिप टृे में रख दिए।

वेटर ने टिप तो ले लिया पर उसके मुंह पर आया हुआ आश्चर्य का भाव गेटस की दृष्टि से ओझल न रह सका।
उसी को भांपते हुए उनहोंने पूछा–क्या कोई खास बात है?
वेटर ने कहा– जी, अभी दो दिन पहले की बात है इसी मेज पर आपकी बेटी ने लंच किया और मुझे बतौर टिप पांच सौ डालर दिये थे और आप उनके पिता दुनिया के सबसे अमीर आदमी होने के बावजूद मुझे केवल पांच डालर दिये हैं।
मुस्कुराते हुए गेटस बोले– हां, क्योंकि वह दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति की बेटी है और मैं एक लकडहारे का बेटा हुं।

...............
मुझे अपना अतीत सदा याद रहता है,
क्योंकि वह मेरा सर्वोत्तम मार्गदर्शक है।
(एक मैगजीन से)

इस कहानी को आज के संदर्भ में परखें-

युद्ध महीनों से चल रहा था. दिन ढलने के बाद आज का युद्ध विराम हुआ. राजा अपने सेनापति को निर्देश के साथ सुबह की रणनीति तय करके, अपने कुछ मंत्रियों एवं एक सेना की टुकड़ी के साथ अपने विश्रामस्थल लौट रहे थे. अंधेरा बढ़ रहा था. राजा का छोटा काफिला एक गांव के किनारे से गुजर रहा था. तभी गांव से एक महिला रोते-चीखते खेत की तरफ बेसुध भागी जा रही थी. दूसरी ओर, उसके पीछे एक आदमी हाथ मे लाठी लिये बेतहाशा उसका पीछा कर रहा था. रोने की आवाज़ सुनकर,राजा की नजर उस पीड़ित भागती महिला पर पड़ी. राजा ने महावत से तुरन्त हाथी रोकने को कहा. राजा का हाथी रुकते ही.. पूरी सेना की टुकड़ी ठिठककर खड़ी हो गई.

राजा ने तत्क्षण अपने दो सैनिकों को आदेश दिया- "जाओ! उस महिला को बुलाकर यहाँ लाओ और हाँ! वो आदमी न भागने न पाये जो उसका पीछा कर रहा है."

सैनिक - " जो आज्ञा महाराज!"

पांच मिनट के अन्दर रणबांकुरे महिला को सम्मान से तथा आदमी को घसीटकर राजा के समक्ष पेश किये.

राजा ने हाथी पर से ऊंचे स्वर में उस आदमी से पूछा- " क्यों मार रहे हो इस महिला को"

आदमी- "इ हमारी मेहरारु है महाराज"

राजा (क्रोधित होकर)- " मेहरारू होने के कारण पीट रहे हो या उसने कोई गलती की है"

आदमी- " गलती हो गई महाराज! बात मेहरारू की नहीं है...दरअसल इ खाना चटख नाहीं बनाती.. हम रोज कहते हैं खाना तड़क बने..तनिक चटनी बन जाये...लेकिन इ है कि मनबे नाहीं करत"

राजा- " अच्छा! चटखदार खाने के शौकीन हो...

आदमी- "जी महाराज! शाम के बेला तनि चटख खोजते हैं."

 राजा- " खुद बना लेते हो या सिर्फ दूसरे के भरोसे खोजते हो."

आदमी- " हाँ महाराज! हम बहुत अच्छा खाना बनाते हैं, चटख तो इतना कि दिन भर जुबान से स्वाद न उतरे"

राजा- " तो क्यों नहीं अपनी मेहरारू को भी सिखा देते..बढ़िया और चटख बनाना"

आदमी- " बहुत सिखाते हैं महाराज! लेकिन इसको तो जैसे कोई शौक ही नहीं."

राजा (महिला की तरफ मुखातिब होकर)- " क्या तुम्हारा आदमी ठीक कह रहा है? क्यों नहीं बनाती बढ़िया चटखदार"

औरत- "महाराज!एक नम्बर का निकम्मा मरद है इ. दिनभर मोदक खाकर घूमता है और रात को थरिया भर भकोसता है.. ऊपर से रोज चटख मांगता है.. बताइए! हम कहां से रोज चटख बनायेंगे. हम इनसे कह रहें हैं कि राज पर संकट है. हमारे राजा और सैनिक युद्ध में लगे हैं.. और एक तुम हो दिनभर मोदक खाकर घूमते रहते हो और रात में चूल्हे में घुसकर चटख खोज रहे हो.. बस एही बात पर पीट रहें हैं हमको...बहुत मारे हैं महाराज बहुत.

( राजा औरत की बात सुनकर गंभीर हो गये)

राजा ( आदमी से)- " सुनो! जैसा कि तुम्हारे बात में मालूम होता है कि तुम एक हुनरमंद आदमी हो, भगवान ने तुम्हें खाना खाने और बनाने दोनों की भरसक तमीज़ दी है इसलिए मुझे लगता है कि तुम जैसे पाककला के दक्ष व्यक्ति और कुशल हाथों को एक उचित स्थान मिलना चाहिए.. इसलिए मेरा यह आदेश है कि कल से तुम सेना के साथ युद्ध स्थल पर रहोगे तथा सैनिकों के लिए चटखदार भोजन बनाओगे. वहां भोजनगृह में श्रेष्ठ एवं स्वादिष्ट भोजन हेतु सभी आवश्यक सामग्री उपलब्ध है. यद्यपि तुम कोई ऐसी सामग्री जानते हो जिससे भोजन और स्वादिष्ट और चटख बने तो तुम रसोई के प्रबंधक से बता देना.. सब प्रबन्ध हो जायेगा.. कल से हम सब तुम्हारे हाथ का भोजन ग्रहण करेंगे.

आदमी- " क्षमा करें महाराज! गलती हो गई मुझसे.. कान पकड़ता हूँ प्रभु॥"

राजा- " तुमसे कोई गलती नहीं हुई. आज राज्य को तुम्हारे जैसे ही कुशल, दक्ष एवं स्वाद के पारखी की आवश्यकता है क्योंकि हमारी सेना महीनों से रूखा-सूखा खाकर बोर हो गई है"

महिला (बीच में बात काटकर)- " महाराज!यह एक नम्बर का निकम्मा है.. सतुआ नहीं घोर पायेगा.. खाना बनाना तो दूर की बात है.. इसके चक्कर में हमारे सैनिक भूखे रह जायेंगे"

राजा- " तुम निश्चिंत रहो! जब यह अपने लाठी से तुमको पीटकर चटख खाना बनवा सकता है तो मेरे पास तो पीटने वालों की फौज है, तुम जाओ! तुरन्त इसका बोरिया बिस्तर बांधो कल सुबह से ही इसे ही चूल्हा फूंकना है.. इसे भी तो पता चले कि युद्ध में लड़ना और चूल्हे पर बैठकर चटखारे लगाने में कितना फर्क़ है"

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पापा पापा मुझे चोट लग गई खून आ रहा है

5 साल के बच्चे के मुँह से सुनना था
कि पापा सब कुछ छोड़ छाड़ कर
गोदी में उठाकर एक किलो मीटर की दूरी पर क्लिनिक तक भाग भाग कर ही पहुँच गए

दुकान कैश काउंटर सब नौकर के भरोसे छोड़ आये

सीधा डाक्टर के केबिन में दाखिल होते हुए डॉक्टर को बोले
देखिये देखिये डॉक्टर
मेरे बेटे को क्या हो गया

डॉक्टर साहब ने देखते हुए कहा
अरे भाई साहब घबराने की कोई बात
है मामूली चोट है.... ड्रेसिंग कर दी है
ठीक हो जायेगी।

डॉक्टर साहब कुछ पेन किलर लिख देते दर्द कम हो जाता । अच्छी से अच्छी दवाईया लिख देते ताकि
जल्दी ठीक हो जाये घाव भर जाये
डाक्टर अरे भाई साहब क्यों इतने परेशान हो रहे हो कुछ नहीं हुआ है
3-4दिन में ठीक हो जायेगा

पर डॉक्टर साहब इसको रात को नींद तो आजायेगी ना ।

डॉक्टर अरे हाँ भाई हाँ आप चिंता मत करो। बच्चे को लेकर लौटे तो नौकर बोला सेठ जी आपका ब्रांडेड महंगा शर्ट खराब हो गया खून लग गया अब
ये दाग नही निकलेंगे

भाई साहब कोई नहीं
ऐसे शर्ट बहुत आएंगे जायेंगे मेरे बेटे का खून बह गया वो चिंता खाये जा रही है कमजोर नहीं हो जाये । तू जा एक काम कर थोड़े सूखे मेवे फ्रूट ले आ इसे खिलाना पड़ेगा और मैं चलता हूँ घर पर

40 साल बाद

दुकान शोरूम में तब्दील हो गई है

 भाई साहब का बेटा बिज़नस बखूबी संभाल रहा है
 भाई साहब रिटायर्ड हो चुके हैं घर पर ही रहते है
तभी घर से बेटे की बीवी का फोन आता है

बीवी 📞अजी सुनते हो ये आपके पापा पलंग से गिर गए हैं
सर पर से खून आ रहा है

लड़का 📱 अरे यार ये पापा भी न
इनको बोला ह जमीन पर सो जाया करो पर मानते हीे नही पलंग पर ही सोते है  

अरे रामु काका जाओ तो घर पर पापा को डॉक्टर अंकल के पास ले कर आओ मैं मिलता हूँ वहीँ पर।

बूढ़े हो चुके रामु काका चल कर धीरे धीरे घर जाते है
तब तक सेठजी का काफी खून बह चुका था

बहु मुँह चढ़ा कर बोली
ले जाओ जल्दी पूरा महंगा कालीन खराब हो गया है

 काका जैसे तैसे जल्दी से रिक्शा में सेठजी को डाल कर
क्लीनिक ले गए

बेटा अब तक नही पंहुचा था
काका ने फोन किया तो बोला
अरे यार वो कार की चाबी नही मिल रही थी अभी मिली है
थोड़े कस्टमर भी है आप बैठो लेकर मैं आता हूँ

जो दूरी 40 साल पहले एक बाप ने
बेटे के सर पर खून देखकर 10 मिनट में बेटे को गोदी में उठा कर भाग कर तय कर ली थी

बेटा 1घन्टा 10 मिनट में कार से भी तय नही कर पाया था

 डाक्टर ने जैसे ही भाई साहब को देखा उनको अंदर ले गए इलाज चालू किया
तब तक बेटा भी पहुँच गया
डॉक्टर अंकल बोले
बेटे खून बहुत बह गया है
एडमिट कर देते तो ठीक रहता

बेटा अरे कुछ नही डाक्टर साहब
आप ड्रेसिंग कर दो ठीक हो जायेगा
2-4 दिन में ।

डाक्टर अंकल बोले ठीक है कुछ दवाईया लिख देता हूँ थोड़ी महंगी है लेकिन आराम जल्दी हो जायेगा

लड़का अरे डॉक्टर अंकल चलेगा 4-5 दिन ज्यादा लगेंगे तो अब इतनी महंगी दवाइयो की क्या जरूरत । चलो मुझे निकलना पड़ेगा शोरूम पर कोई नहीं है ।

ये सुनते ही डॉक्टर अंकल के सब्र का बांध टूट गया
और 40 साल पहले की घटना पूरी सुनाई

बेटे की आँखों आंसू बहने लगे उसे बहुत पस्च्याताप हुआ।

तभी बहू का फोन आया
वो महंगा कालीन खराब हो गया है
क्या करूँ ।

बेटा बोला कालीन ही खराब हुआ है ना .....
नया आजायेगा
तुम पलंग पर नया चद्दर और गद्दा डालो मैँ पापा को ले कर आ रहा हूँ

भाई साहब के आँखों में आँसू थे
और ये ख़ुशी के थे

चोट का दर्द गायब था बेटे
के अपनेपन ने सब भुला दिया।

बस अब तो मौत भी आ जाये तो
मंजूर है ।

दोस्तों ये आज की सच्चाई है
आज हमारे अंदर का इंसान मर चुका है ।

माँ बाप अकेलेपन का जीवन जी
रहे हैं

और

बेटा कामयाबी और दौलत
की चकाचौंध में खो कर सब कुछ भूल चुका है ।
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मुट्ठी भर लोग! :
साहस पर कहानी

हर साल गर्मी की छुट्टियों में नितिन अपने दोस्तों के साथ किसी पहाड़ी इलाके में माउंटेनियरिंग के लिए जाता था. इस साल भी वे इसी मकसद से ऋषिकेश पहुंचे.

गाइड उन्हें एक फेमस माउंटेनियरिंग स्पॉट पर ले गया. नितिन और उसके दोस्तों ने सोचा नहीं था कि यहाँ इतनी भीड़ होगी. हर तरफ लोग ही लोग नज़र आ रहे थे.

एक दोस्त बोला, ” यार यहाँ तो शहर जैसी भीड़ है…यहाँ चढ़ाई करने में क्या मजा??”

“क्या कर सकते हैं… अब आ ही गए हैं तो अफ़सोस करने से क्या फायदा…चलो इसी का मजा उठाते हैं…”, नितिन ने जवाब दिया.

सभी दोस्त पर्वतारोहण करने लगे और कुछ ही समय में पहाड़ी की चोटी पर पहुँच गए.

वहां पर पहले से ही लोगों का तांता लगा हुआ था. दोस्तों ने सोचा चलो अब इसी भीड़ में दो-चार घंटे कैम्पिंग करते हैं और फिर वापस चलते हैं. तभी नितिन ने सामने की एक चोटी की तरफ इशारा करते हुए कहा, “रुको-रुको… ज़रा उस चोटी की तरफ भी तो देखो… वहां तो बस मुट्ठी भर लोग ही दिख रहे हैं… कितना मजा आ रहा होगा… क्यों न हम वहां चलें.”

“वहां!”, एक दोस्त बोला, “अरे वहां जाना सबके बस की बात नहीं है… उस पहाड़ी के बारे में मैंने सुना है, वहां का रास्ता बड़ा मुश्किल है और कुछ लकी लोग ही वहां तक पहुँच पाते हैं.”

बगल में खड़े कुछ लोगों ने भी नितिन का मजाक उड़ाते हुए कहा,” भाई अगर वहां जाना इतना ही आसान होता तो हम सब यहाँ झक नहीं मार रहे होते!”

लेकिन नितिन ने किसी की बात नहीं सुनी और अकेला ही चोटी की तरफ बढ़ चला. और तीन घंटे बाद वह उस पहाड़ी के शिखर पर था.

वहां पहुँचने पर पहले से मौजूद लोगों ने उसका स्वागत किया और उसे एंकरेज किया.

नितिन भी वहां पहुँच कर बहुत खुश था अब वह शांति से प्रकृति की ख़ूबसूरती का आनंद ले सकता था.

जाते-जाते नितिन ने बाकी लोगों से पूछा,”एक बात बताइये… यहाँ पहुंचना इतना मुश्किल तो नहीं था, मेरे ख़याल से तो जो उस भीड़-भाड़ वाली चोटी तक पहुँच सकता है वह अगर थोड़ी सी और मेहनत करे तो इस चोटी को भी छू सकता है…फिर ऐसा क्यों है कि वहां सैकड़ों लोगों की भीड़ है और यहाँ बस मुट्ठी भर लोग?”

वहां मौजूद एक वेटरन माउंटेनियर बोला, “क्योंकि ज्यादातर लोग बस उसी में खुश हो जाते हैं जो उन्हें आसानी से मिल जाता…वे सोचते ही नहीं कि उनके अन्दर इससे कहीं ज्यादा पाने का पोटेंशियल है… और जो थोड़ा पाकर खुश नहीं भी होते वे कुछ अधिक पाने के लिए रिस्क नहीं उठाना चाहते… वे डरते हैं कि कहीं ज्यादा के चक्कर में जो हाथ में है वो भी ना चला जाए… जबकि हकीकत ये है कि अगली चोटी या अगली मंजिल पाने के लिए बस जरा से और एफर्ट की ज़रुरत पड़ती है! पर साहस ना दिखा पाने के कारण अधिकतर लोग पूरी लाइफ बस भीड़ का हिस्सा ही बन कर रह जाते हैं… और साहस दिखाने वाली उन मुट्ठी भर लोगों को लकी बता कर खुद को तसल्ली देते रहते हैं.”

Friends, अगर आप आज तक वो अगला साहसी कदम उठाने से खुद को रोके हुए हैं तो ऐसा मत करिए क्योंकि-

अगली चोटी या अगली मंजिल पाने के लिए बस जरा से और एफर्ट की ज़रुरत पड़ती है!

खुद को उस effort को करने से रोकिये मत … थोडा सा साहस… थोड़ी सी हिम्मत आपको भीड़ से निकाल कर उन मुट्ठी भर लोगों में शामिल कर सकती है जिन्हें दुनिया lucky कहती है.

कोई कहे की की हिन्दू मूर्ती पूजा क्यों करते हैं तो उन्हें बता दें मूर्ती पूजा का रहस्य :-

स्वामी विवेकानंद को एक मुस्लिम नवाब ने अपने भवन में बुलाया और बोला, "तुम हिन्दू लोग मूर्ती की पूजा करते हो!

मिट्टी, पीतल, पत्थर की मूर्ती का.! पर मैं ये सब नही मानता। ये तो केवल एक पदार्थ है।"

उस राजा के सिंहासन के पीछे किसी आदमी की तस्वीर लगी थी। विवेकानंद जी कि नजर उस तस्वीर पर पड़ी।

विवेकानंद जी ने राजा से पूछा, "राजा जी, ये तस्वीर किसकी है?"
राजा बोला, "मेरे पिताजी की।"

स्वामी जी बोले, "उस तस्वीर को अपने
हाथ में लीजिये।"
राजा तस्वीर को हाथ मे ले लेता है।

स्वामी जी राजा से : "अब आप उस तस्वीर पर थूकिए!"
राजा : "ये आप क्या बोल रहे हैं
स्वामी जी?
स्वामी जी : "मैंने कहा उस तस्वीर पर थूकिए..!"
राजा (क्रोध से) : "स्वामी जी, आप होश मे तो हैं ना? मैं ये काम नही कर सकता।"

स्वामी जी बोले, "क्यों? ये तस्वीर तो केवल एक कागज का टुकड़ा है, और जिस पर कूछ रंग लगा है। इसमे ना तो जान है, ना आवाज, ना तो ये सुन सकता है, और ना ही कूछ बोल सकता है।"

और स्वामी जी बोलते गए, "इसमें
ना ही हड्डी है और ना प्राण। फिर भी आप इस पर कभी थूक नही सकते। क्योंकि आप इसमे अपने पिता का स्वरूप देखते हो।

और आप इस तस्वीर का अनादर करना अपने पिता का अनादर करना ही समझते हो।"

थोड़े मौन के बाद स्वामी जी आगे कहाँ,
"वैसे ही, हम हिंदू भी उन पत्थर, मिट्टी,
या धातु की पूजा भगवान का स्वरूप मान
कर करते हैं।

भगवान तो कण-कण मे है, पर एक
आधार मानने के लिए और मन को एकाग्र करने के लिए हम मूर्ती पूजा करते हैं।"

स्वामी जी की बात सुनकर राजा ने स्वामी जी से क्षमा माँगी।

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